Bihar Elections: बिहार में मुस्लिमों की आबादी 17.70 फीसदी, सत्ता में भागीदारी 10% भी नहीं
Bihar Elections: बिहार की राजनीति में मुस्लिम वर्ग का योगदान दरकिनार नहीं किया जा सकता है। करीब 50-70 सीटों पर मुस्लिम वोटर हमेशा से निर्णायक रहे हैं। यही वजह है कि मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए सभी पार्टियां तरह-तरह के वादे-भरोसे दिलाते हैं।

वर्ष 2023 में बिहार सरकार के कराए जाति आधारित जनगणना में बिहार में मुसलमानों की संख्या 2.30 करोड़ के करीब बताई गई। यानी कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी 17.70 प्रतिशत पाई गई। लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी 10 फीसदी के पार भी नहीं हो पाई है। यह हाल दशकों से है। वर्ष 1985 का विधानसभा चुनाव अपवाद रहा, जिसमें इस बिरादरी की भागीदारी 10 फीसदी से अधिक रही। इस वर्ष 324 सीट पर हुए चुनाव में 34 मुसलमान विधायक बने।
बिहार की राजनीति में मुस्लिम वर्ग का योगदान दरकिनार नहीं किया जा सकता है। करीब 50-70 सीटों पर मुस्लिम वोटर हमेशा से निर्णायक रहे हैं। यही वजह है कि मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए सभी पार्टियां तरह-तरह के वादे-भरोसे दिलाते हैं। लेकिन टिकट देने और सत्ता तक पहुंचाने में कमोबेस तमाम पार्टियों ने कंजूसी की है। कभी मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के साथ थे। सत्ता में उचित भागीदारी नहीं मिली तो धीरे-धीरे ये मतदाता कटते रहे।
पहले समाजवादियों, फिर भाजपा के संपर्क में आने लगे। भाजपा उस वक्त हिन्दूवादी पार्टी नहीं मानी जाती थी। भाजपा से कई मुस्लिमों को टिकट मिला, लेकिन सत्ता तक बिरले ही पहुंचे। इनमें एक थे भागलपुर के मो. निहालउद्दीन। निहालउद्दीन एकीकृत बिहार के गोड्डा के महगामा से 1985 में भाजपा के उम्मीदवार बनाए गए थे। हालांकि वे हार गए। बाद में निहाल ने कांग्रेस का दामन थामा।
हिन्दूवादी तमगा मिलने के बाद भाजपा ने भागलपुर से ही मुस्लिम चेहरे सैयद शाहनवाज हुसैन पर दांव खेला। शाहनवाज दो बार सांसद बने। शाहनवाज का संयोग देखिए वे वाजपेयी शासन में केंद्रीय मंत्री बने और मोदी राज में नीतीश के नेतृत्व की सरकार में राज्य के मंत्री भी बने। हालांकि पिछले एक दशक से वे भी टिकट की आस में हैं।
भागलपुर हिंसा के बाद मुस्लिम कांग्रेस से बिदके
बिहार में मुस्लिम राजनीति को करीब से देखने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता शाहीद मंजूर बताते हैं, वर्ष 1989 में हुए भागलपुर हिंसा के बाद मुस्लिम वोटरों का कांग्रेस से मोहभंग हो गया और ये लोग जनता दल को अपना समझने लगे। जनता दल के टूटने के बाद जब क्षेत्रीय राजनीति चरम पर आई तो कभी राजद, कभी जदयू तो कभी लोजपा पर भी एतबार किया। भाजपा के साथ जब जदयू या लोजपा आई तब अल्पसंख्यकों का विश्वास राजद के प्रति जगा। माई समीकरण के बहाने इसका फायदा राजद ने भरपूर उठाया। धीरे-धीरे अल्पसंख्यक कांग्रेस से कटते चले गए।
वर्तमान विधानसभा में सिर्फ 19 मुस्लिम विधायक हैं
1951-52 के पहले चुनाव में 276 सीट में 24 पर मुस्लिम जीते। वर्ष 1985 में सबसे अधिक 34, जबकि 2005 में सबसे कम 16 जीते। वर्तमान में मात्र 19 मुस्लिम विधायक हैं। अभी इसरेल मंसूरी, शमीम अहमद, अली अशरफ सिद्दीकी, मोहम्मद नेहालुद्दीन, अख्तरुल इस्लाम, यूसुफ सलाहुद्दीन, सऊद आलम, कामरान, अख्तरुल ईमान, मोहम्मद अंजार, रुकुनुद्दीन, इजहार, शहनवाज, शकील अहमद, अफाक आलम, अबीदुर रहमान, इजहारुल हुसैन, महबूब आलम, जमान खान विधायक हैं।
गैरभाजपा पार्टियों से मुस्लिम महिलाओं को टिकट नहीं
कांग्रेस से जुड़े निहालउद्दीन बताते हैं, बिहार में मुस्लिम वोटर तो बढ़े लेकिन सदन में संख्या अपेक्षाकृत कम है। इसका कारण यह कौम सभी पार्टियां की वोट बैंक तक ही सीमित रह गई है। मुस्लिम वोटरों को सिर्फ बूथ पर गैर भाजपा को वोट देने के लायक समझा जाता है। आबादी के हिसाब से देखा जाए तब भी कई सीटों पर बिरादरी की उपेक्षा ही हुई है। गैरभाजपा पार्टियों ने मुस्लिम महिलाओं को टिकट नहीं दिया या कम दिया। यही वजह है कि प्रतिनिधित्व के नाम पर सिर्फ एक नाम जोहरा अहमद ही रिकॉर्ड में है। जोहरा 1962 में पटना पूर्व की विधायक बनीं। अब वह भी जिंदा नहीं हैं। भागलपुर की बात करें तो पांच मुसलमान ही विधायक बने।
खगड़िया के अधिवक्ता मुख्तार अब्बासी बताते हैं, मुस्लिम वोटरों के बिखराव को रोकने के लिए पिछले एक दशक से बिहार में कई नये प्रयोग हुए। खासकर कोसी-सीमांचल में। कटिहार में एनसीपी तो किशनगंज में ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने मुस्लिम वोटरों पर डोरे डाले और आंशिक सफलता भी मिली। लोजपा-जदयू ने भी मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए कई जगहों पर मुस्लिम प्रत्याशी उतारे। फिर भी मुस्लिमों में टीस बरकरार है कि आबादी के हिसाब से उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।




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