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मखाना विकास बोर्ड बनने से किसानों को कितना फायदा? बिहारी सुपरफूड की है भारी डिमांड

देश के कुल मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी 85 फीसदी है। राज्य के 50 से 60 हजार किसान और मजदूर मखाना की खेती से सीधे जुड़े हैं। अकेले मधुबनी में मखाना की खेती से करीब 10 हजार से अधिक किसान जुड़े हैं। बिहार में अभी 40 से 45 हजार हेक्टेयर में इसकी खेती होती है।

Wed, 17 Sep 2025 05:39 AMNishant Nandan हिन्दुस्तान, पटना/मुजफ्फरपुर
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मखाना विकास बोर्ड बनने से किसानों को कितना फायदा? बिहारी सुपरफूड की है भारी डिमांड

बिहारी सुपरफूड जलफल मखाना की गूंज अब देश-दुनिया में सुनाई देने लगी है। इसका बड़ा श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है। मखाना की ब्रांडिंग करने में उन्होंने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके सुबह के नाश्ता में रोज मखाना शामिल रहता है। सोमवार को पूर्णिया के मंच से प्रधानमंत्री ने बताया कि मखाना बोर्ड के गठन की अधिसूचना जारी कर दी गई है। जाहिर है केन्द्र और राज्य सरकार मखाना में जिस तरह संभावनाएं देख रही हैं-उससे लगता है कि देश की हर थाली में एक बिहारी व्यंजन का सपना पूरा करने में यह सफल साबित होगा।

बिहार के मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, खगड़िया, मुजफ्फरपुर, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण समेत सोलह जिलों में मखाना की खेती होती है। देश के कुल मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी 85 फीसदी है। राज्य के 50 से 60 हजार किसान और मजदूर मखाना की खेती से सीधे जुड़े हैं। अकेले मधुबनी में मखाना की खेती से करीब 10 हजार से अधिक किसान जुड़े हैं। बिहार में अभी 40 से 45 हजार हेक्टेयर में इसकी खेती होती है और उत्पादन 70 हजार टन सालाना होता है।

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हर साल 12 फीसदी का ग्रोथ

एक हेक्टेयर में लगभग 21 क्विंटल मखाना बीज का उत्पादन होता है। मखाना बीज या दाना का 7 लाख 50 हजार क्विंटल उत्पादन है। इसमें 40 फीसदी लावा तैयार होता है। यानी एक किलो मखाना बीज या दाना से 400 ग्राम लावा मिलता है। इस तरह राज्य में मखाना लावा लगभग 3 लाख क्विंटल तैयार होता है। मखाना की खेती में होनेवाले लाभ व सरकारी अनुदान को देखते हुए किसानों ने लीज पर जमीन लेकर भी खेती शुरू कर दी है।

जानकारों की मानें तो प्रतिवर्ष मखाना के कारोबार में 12 प्रतिशत का ग्रोथ है। इस वक्त मखाना का सालाना कारोबार करीब सात से आठ हजार करोड़ का है। अनुमान है कि अगले एक दशक में यह 50 हजार करोड़ से अधिक का हो जाएगा। राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार बताते हैं कि मखाना की खेती से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर करीब ढाई लाख लोग जुड़े हैं।

बोर्ड की स्थापना के बाद कितना बदलेगा मखाना

जानकारों के मुताबिक मखाना विकास बोर्ड के गठन से इसकी खेती और मशीनीकरण का विस्तार होगा। प्रसंस्करण, मूल्यवर्द्धन, विपणन और निर्यात में तेजी आएगी। प्रशिक्षण, भंडारण, ब्रांडिंग तथा वित्तीय सहायता का लाभ होगा। बिहारी मखाने को सुपर फूड के रूप में ग्लोबल पहचान मिल चुकी है। आने वाले समय में इसमें और विस्तार होगा।

अबतक क्या-क्या हुआ

केन्द्र सरकार ने 2025-26 के आम बजट में बिहार में मखाना बोर्ड के गठन का ऐलान किया था। इससे पूर्व, 2022 में मिथिला मखाना नाम से मखाना को जीआई टैग मिला था। मखाना के क्षेत्र में भोला पासवान शास्त्री एग्रीकल्चर कॉलेज बिहार का राज्यस्तरीय नोडल केन्द्र है। वहीं, दरभंगा मखाना अनुसंधान केंद्र को 2023 में राष्ट्रीय दर्जा दिया गया।

उत्पादन और स्वरोजगार बढ़ेगा

मखाना विकास बोर्ड बिहार की कृषि में स‌फेद क्रांति का आगाज है। राज्य सरकार के बाद केन्द्र सरकार की मेहरबानी से अब किसानों और मजदूरों को जरूरी उपकरण मिलेंगे। इससे मखाने की खेती को और पंख लगेंगे। प्रसंस्करण आसान हो जाएगा। उत्पादन और स्वरोजगार बढ़ेगा। अभी लगभग 45 देश के लोग बिहारी मखाने का स्वाद चख रहे हैं। शीघ्र ही यह आंकड़ा 100 पार होने वाला है। विदेशों में मखाना की कीमत 5 हजार से 15 हजार रुपए प्रति किलो है। अमेरिका में प्रति किलो 10 से 15 हजार रुपए में मिलता है।

निर्यात कहां-कहां

बिहार से सबसे अधिक मखाना अमेरिका जाता है। इसके बाद नेपाल, कनाडा, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड और खाड़ी देशों में मखाने की प्रचूर मांग है। देश के हर हिस्से में इसकी पहुंच पहले से ही है।चंपारण से लेकर अररिया, किशनगंज, दरभंगा, सीतामढ़ी तक तालाब, आहर, पाइन कम हो रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में लगभग 70 हजार तालाब, पोखर व जल निकाय खत्म हुए हैं।

जलफल मखाना का रकबा बचाकर रखना एक बड़ी चुनौती है। मखाना किसानों और उद्यमियों के बीच अभी एक बड़ी खाई है। किसान-मजदूरों तक कम पैसा जा पाता है। व्यापारी और मजदूरों के बीच की इस खाई को पाटना होगा। ताकि, मखाना बोर्ड के गठन से जो एक उत्साह पनपा है उसका भरपूर फायदा मिल सके।

मखाना अनुसंधान परियोजना, भोला पासवान शास्त्री कोशी महाविद्यालय पूर्णिया के प्रधान अन्वेषक, डॉ अनिल कुमार ने कहा कि भूजलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। जो भी चौर हैं, उनमें वर्षा जल को रोका जाय। इससे ग्राउंड वाटर स्तर सुधरेगा। जमीन के ऊपर भी पानी मिलेगा। हार्वेस्टिंग और पॉपिंग मशीन किसानों के लिए जितना जरूरी है उससे अधिक जरूरी है कि तेजी से कम होते जा रहे तालाब, पोखर और आहर-पइन को बचाया जाए।

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