बिहार में चूहे डकार गए रिश्वत के नोट, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार- कहा, “इस दलील पर भरोसा करना मुश्किल”
बिहार में 2014 के एक रिश्वत कांड में जब्त नोटों को चूहों द्वारा कुतरे जाने की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने इसे सुरक्षा में बड़ी लापरवाही बताया और कहा कि नोट नष्ट होने के इस कारण पर भरोसा नहीं किया जा सकता। फिलहाल, आरोपी महिला अधिकारी को जमानत मिल गई है।

Patna News: बिहार में भ्रष्टाचार के एक पुराने मामले ने अब देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचा है। मामला दिलचस्प और हैरान करने वाला इसलिए है क्योंकि यहाँ भ्रष्टाचार के सबूत के तौर पर जब्त किए गए नोटों को 'चूहों' ने कुतर डाला है। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल इस जानकारी पर हैरानी जताई है, बल्कि मालखाने की सुरक्षा और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने दो टूक कहा कि नोट नष्ट होने का जो कारण बताया गया है, वह गले नहीं उतरता और इस पर भरोसा करना नामुमकिन है।
क्या है पूरा मामला?
बता दें कि यह मामला साल 2014 का है, जब बिहार की एक महिला बाल विकास कार्यक्रम अधिकारी पर ₹10,000 की रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। कार्रवाई के दौरान कथित तौर पर रिश्वत के नोट जब्त किए गए थे। निचली अदालत ने पहले महिला अधिकारी को बरी कर दिया था, लेकिन फरवरी 2025 में पटना हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए उन्हें सजा सुनाई थी। जब यह मामला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ के समक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो दस्तावेजों में दर्ज यह जानकारी देखकर जज दंग रह गए कि मालखाने की खराब हालत के कारण चूहों ने उन नोटों को ही नष्ट कर दिया, जो सबसे बड़े सबूत थे।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
पीठ ने दस्तावेजों पर गौर करते हुए सुरक्षा में लापरवाही पर भारी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा, “नोट नष्ट होने के बारे में जो सफाई दी गई है, उस पर भरोसा नहीं होता। अगर ऐसा है, तो यह बताता है कि अपराधों में बरामद किये जाने वाले कितने ही सामान खराब हो जाते होंगे। यह स्थिति डराने वाली है क्योंकि न जाने कितने ही मामलों में जब्त सामान इसी तरह नष्ट हो जाता होगा। यह सीधे तौर पर राज्य के राजस्व का भारी नुकसान है।”
कोर्ट ने मालखाने की जर्जर स्थिति पर भी सवाल उठाए और कहा कि अगली सुनवाई में इस मुद्दे पर गहराई से विचार किया जाएगा। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया के बीच सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में उक्त महिला अधिकारी को आत्मसमर्पण करने से छूट दी थी, और अब उन्हें जमानत दे दी गई है। लेकिन 'चूहों' वाली इस कहानी ने एक बार फिर बिहार में प्रशासनिक व्यवस्था और साक्ष्यों के रखरखाव की पोल खोलकर रख दी है।




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