Parshuram Jayanti 2026: भगवान शिव ने दी शस्त्र की विद्या, मां का ही वध किया, जानें कौन थे भगवान परशुराम?
हर साल वैशाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का खास महत्व होता है। क्योंकि इसी दिन भगवान परशुराम की जयंती मनाई जाती है।

आज यानी 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जा रहा है। हर साल वैशाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का खास महत्व होता है। क्योंकि इसी दिन भगवान परशुराम की जयंती मनाई जाती है। हिंदू मान्यता के अनुसार उन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, जो कि पृथ्वी पर अन्याय और अधर्म का नाश करने के लिए त्रेतायुग में अवतरित हुए थे। ज्ञान, तप और शक्ति के प्रतीक माने जाने वाले भगवान परशुराम अष्टचिरंजीवी में से एक हैं और हर युग में पृथ्वी पर मौजूद रहते हैं। इस मौके पर आइए जानते हैं कि परशुराम भगवान कौन थे।
कौन हैं भगवान परशुराम
भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनके पिता जमदग्नि और माता रेणुका थीं। उनके चार बड़े भाई भी थे। परशुराम चार भाइयों रुक्मवान, सुषेण, वसु और विश्वावसु के बाद थे। वह अत्यंत क्रोधी स्वभाव के थे। परशुराम का असली नाम राम था। भगवान शिव ने उन्हें शस्त्र की विद्या दी थी। लेकिन जब उन्हें भगवान शिव से परशु (फरसा) मिला और उन्होंने उसे धारण किया, तब से वे परशुराम कहलाए। मान्यता है कि उनका अवतार पृथ्वी पर अधर्म और दुष्टों का नाश करने तथा कमजोरों की रक्षा के लिए हुआ था।
परशुराम के गुरु
परशुराम ने शास्त्रों की शिक्षा अपने दादा ऋचीक और पिता जमदग्नि से प्राप्त की। वहीं शस्त्र की शिक्षा उन्हें विश्वामित्र और भगवान शिव से मिली। वे योग, वेद और नीति के अच्छे ज्ञाता थे और ब्रह्मास्त्र जैसे दिव्य अस्त्रों के प्रयोग में भी निपुण थे। उन्होंने विश्वामित्र और ऋचीक के आश्रम में रहकर शिक्षा हासिल की।
परशुराम के शिष्य
त्रेता युग से लेकर द्वापर युग तक परशुराम के अनेक शिष्य रहे। महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण को भी उन्होंने ही अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी थी। परशुराम का जीवन ज्ञान, शक्ति और संघर्ष से भरा माना जाता है।
मां का सिर काट दिया था
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम के पिता का नाम जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था। एक बार उनकी माता से अनजाने में गलती हो गई, जिससे नाराज होकर जमदग्नि ऋषि ने अपने बेटों को उनका वध करने का आदेश दिया। बड़े बेटों ने यह करने से मना कर दिया, तो ऋषि ने उन्हें श्राप देकर उनकी बुद्धि छीन ली। इसके बाद जब परशुराम वहां पहुंचे, तो उन्होंने बिना देर किए पिता की आज्ञा मानकर अपनी माता का सिर काट दिया। यह देखकर जमदग्नि प्रसन्न हुए और उन्होंने परशुराम से वरदान मांगने को कहा। तब परशुराम ने सबसे पहले अपनी माता को जीवित करने, फिर अपने भाइयों को ठीक करने और अंत में खुद के लिए लंबी आयु और अजेय रहने का वरदान मांगा।
अमर हैं भगवान परशुराम
एक अन्य कथा के अनुसार, एक दिन जब रेणुका स्नान करके लौट रही थीं, तो उन्होंने राजा चित्ररथ को जल में क्रीड़ा करते देखा, जिससे उनका मन विचलित हो गया। जब वे आश्रम लौटीं, तो जमदग्नि ने उनके भाव समझ लिए और क्रोधित हो गए। इसके बाद ही उन्होंने अपने पुत्रों को यह कठोर आदेश दिया था। परशुराम युद्ध कला में अत्यंत निपुण माने जाते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महान योद्धाओं को शिक्षा दी थी। मान्यता है कि वे अमर हैं और भविष्य में कल्कि अवतार को भी युद्ध की शिक्षा देंगे।
डिस्क्लेमरः इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।




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