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Chaitra navratri 2026: नवरात्र का संदेश नव सृष्टि का संदेश है

Navratri kab hain:नवरात्र का पर्व नैसर्गिक पवित्रता और बाल-सुभाव के आवाहन का पर्व है। यह आवाहन जितना सुरुचि से, जितना सादगी से, जितना प्रकृति के साथ संतुलन बुद्धि रखते हुए किया जाए, जितने बाल-सुलभ भाव से, सरल-निश्छल मन से किया जाए, उतनी ही जगदंबा प्रसन्न होती हैं।

Tue, 17 March 2026 10:24 AMAnuradha Pandey लाइव हिन्दुस्तान
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Chaitra navratri 2026: नवरात्र का संदेश नव सृष्टि का संदेश है

नवरात्र का पर्व नैसर्गिक पवित्रता और बाल-सुभाव के आवाहन का पर्व है। यह आवाहन जितना सुरुचि से, जितना सादगी से, जितना प्रकृति के साथ संतुलन बुद्धि रखते हुए किया जाए, जितने बाल-सुलभ भाव से, सरल-निश्छल मन से किया जाए, उतनी ही जगदंबा प्रसन्न होती हैं। नवरात्र का संदेश नव सृष्टि का संदेश है। वर्ष में दो नवरात्र पड़ते हैं- शारदीय और वासंती। चैत्र नवरात्र इस साल 19 से शुरू होंगे और 27 मार्च 2026 को खत्म होंगे । दोनों संपातों में पड़ते हैं। संपात का अर्थ होता है- स्थूल रूप में रात-दिन का बराबर होना। पृथ्वी का सूर्य से सम दूरी होना। सूक्ष्म रूप से इसका अभिप्राय है- संतुलन प्राप्त करने की स्थिति। ताप और शीत के बीच संतुलन होता है।

नवरात्र में जगदंबा की पूजा का विधान इसलिए है कि व्यक्ति की अपनी कोई ऊर्जा है, इसका अभिमान छोड़ने का अभ्यास करे। सबकी ऊर्जा का स्रोत एक है, वह आदिशक्ति है। वही मां है। वही नाना रूपों में व्यक्त होती है। फिर अदृश्य, अव्यक्त करुणा और ममता के प्रवाह में समा जाती है। वह व्यक्त दो कारणों से होती है- एक तो तब, जब आसुरी शक्ति का मद प्रबल हो जाता है। दुर्बल वेध्य बन जाता है। तब वह काली होकर अवतीर्ण होती है। वह शक्ति के मद का मद पीती है। तब वह विकराल होती है। दूसरा कारण है, उसे यों ही लीला करनी होती है। वह छोटी-सी बच्ची बन जाती है। वह बच्चों की मांग पर तरह-तरह के खिलौने बनानेवाली मां बन जाती है।

शक्ति, संयम, नियम से सुरक्षित हों

वह भुवनमोहिनी बन जाती है। वस्तुतः प्रकृति में भी सुषमा तभी होती है, जब वह सु अर्थात अच्छी तरह समता या संतुलन प्राप्त करती है। यह संतुलन पानेवाले या देनेवाले के बीच हो, सोखनेवाले या सींचनेवाले के बीच हो, आवेग और शक्ति के बीच हो। इस नवरात्र में व्रत इसलिए करते हैं कि अपने भीतर की शक्ति, संयम और नियम से सुरक्षित हों। उसका अनावश्यक अपव्यय न हो। पूरी सृष्टि में जो ऊर्जा का प्रवाह आ रहा है, उसे अपने भीतर रखने के लिए भी पात्र की स्वच्छता आवश्यक है। व्रत के साथ हम ऐसे पुष्पों से, ऐसी सुगंधियों से, ऐसे आमोद-प्रमोद के मनोरम उपायों से जगदंबा को रिझाने का प्रयत्न करते हैं, जो इस लोक में सबसे अधिक चटकीले हों, कमनीय हों। गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य का अर्पण इसी भाव से होता है कि इस संसार में जो कुछ सुंदर है, वह सब मां, तुम्हारा ही है। गंध के रूप में पृथ्वी तत्व अर्पित होता है।

सब कुछ तुम्हारा है मां

पुष्प के रूप में पुष्प की तरह खिला हुआ प्रसन्न आकाश अर्पित होता है। धूप के रूप में सर्वशोधक वायु तत्व अर्पित होता है। दीप के रूप में अग्नि तत्व अर्पित होता है और नैवेद्य के रूप में जल का अमृत अर्पित होता है। इन पांचों तत्वों की समष्टि तांबूल के रूप में अर्पित होती है। यह अर्पण इस भाव से होता है कि सीमित परिधि में रहनेवाला तत्व अनंत असीम में निहित तत्व को अर्पित हो जाए। इन पांच तत्वों के अर्पण के साथ-साथ गीत वाद्य भी अर्पित होते हैं। उनके माध्यम से मन अर्पित होता है।

नवरात्र उत्सव के रूप में

इस प्रकार शक्ति के आराधन का यह नवरात्र कार्यक्रम उत्सव के रूप में मनाया जाता है। दुख-सुख दोनों अर्पित होते हैं ऐसी मां को, जो जागती रहती है, हर बच्चे की देखरेख के लिए। वह यह देखती रहती है कि कहीं कोई बच्चा दूसरे बच्चे के साथ अन्याय तो नहीं कर रहा है। सतानेवाले बच्चे को वह दंड देती है, चोट खाए हुए बच्चे को सहलाती है। वह सतानेवाले को बड़ी डरावनी लगती है और सताए जानेवाले को बड़ी दयालु। वह एक ही है। उसी के अनेक रूप दिखाई पड़ते हैं। इन अनेक रूपों में कोई भेद नहीं है। व्यापार में भेद है, तत्त्वतः कोई भेद नहीं है। दो या बहुत दिखने का द्वैत नहीं होता है।

सहज-सरल और निश्छल बनें

यही कारण है कि जगदंबा सबको अपनी वत्सल छाया में समेटती हैं- बड़े-से-बड़े ज्ञानी को, बड़े-से-बड़े विरागी तपस्वी को और अज्ञ-से-अज्ञ, अबोध-से-अबोध जन को, अधम-से-अधम विषयों में फंसे जन को। मां के आगे सब कुछ भूल जाता है। बस, इतना ही याद रहता है- संतान कैसी भी हो, मां तो बस मां होती है। एक बार सब दुरावभर छोड़ दे, उनके आगे सब कुछ रख दें, अपनी दुर्बलता, अपनी क्षमता सब उन्हीं को सौंप दे, उन पर छोड़ दें।ऐसी मां की अर्चना जिस सौष्ठव से, जिस भाव से की जानी चाहिए, वह हो नहीं रही है, इसलिए इतना अमंगल है। देखने में लगता है, बड़ा उत्साह है, बड़ा भावोन्माद है, पर भीतर-भीतर कहीं-न-कहीं दूसरे से बढ़-चढ़कर दिखने का भाव रहता है। जगदंबा यह सहन नहीं करतीं और तब सृष्टि का संतुलन बिगड़ता है।

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नवरात्र का पर्व आवाहन का पर्व

नवरात्र का पर्व नैसर्गिक पवित्रता और बाल-सुभाव के आवाहन का पर्व है। यह आवाहन जितनी सुरुचि से, जितनी सादगी से, जितनी प्रकृति के साथ संतुलन बुद्धि रखते हुए किया जाए, जितने बाल-सुलभ भाव से, सरल-निश्छल मन से किया जाए, उतनी ही जगदंबा प्रसन्न होती हैं। काश, हम आज अमंगल के घेरे में घिरे हुए लोग समझते, तो हमारा आवाहन कर्ण-कटु ध्वनियों का हाहाकार न होता! हमारे आयोजन इतने दिखाऊ और खोखले न होते। नवरात्र का संदेश नव सृष्टि का संदेश है, इसे हम समझ लें, तो विश्व-मंगल का नया अध्याय प्रारंभ हो जाए।

(साभार : ‘भारतीय संस्कृति के आधार’, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से संपादित अंश)

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