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Ganga Saptami 2026: पढ़ें कैसे ऋषि ने मां गंगा को दंड दिया, मां गंगा के उद्भव की कहानी

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि 23 अप्रैल को गंगा ने शिव की जटाओं से पृथ्वी की ओर अपनी यात्रा आरंभ की थी और गंगा दशहरा के दिन गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। 

Tue, 21 April 2026 11:45 AMAnuradha Pandey लाइव हिन्दुस्तान
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Ganga Saptami 2026: पढ़ें कैसे ऋषि ने मां गंगा को दंड दिया, मां गंगा के उद्भव की कहानी

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि 23 अप्रैल को गंगा ने शिव की जटाओं से पृथ्वी की ओर अपनी यात्रा आरंभ की थी और गंगा दशहरा के दिन गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। ‘गंगा सप्तमी’ के दिन गंगा स्नान करने से मनुष्यों को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।

कैसे ऋषि ने गंगा को दंड दिया

एक पौराणिक कथा के अनुसार जब गंगा शिव की जटाओं से पृथ्वी की ओर निकली, तो उनके प्रचंड वेग से पृथ्वी पर उथल-पुथल मच गई। इसी क्रम में गंगा ने ऋषि ‘जाहनु’ के आश्रम को भी तहस-नहस कर दिया और उनकी तपस्या भंग कर दी। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने गंगा को दंड देते हुए उसके समस्त जल को पी लिया। यह देखकर देवताओं ने ऋषि से गंगा को मुक्त करने की प्रार्थना की ताकि वे राजा भगीरथ के पूर्वजों की आत्माओं को मुक्ति प्रदान कर सकें। ऋषि जाहनु ने देवताओं की विनती पर गंगा को मुक्त करते हुए उसे अपने कान से बाहर निकाल कर उसे पुनर्जन्म दिया। इस घटना के बाद से गंगा को ऋषि जाहनु की पुत्री ‘जाह्नवी’भी कहा जाने लगा।

कैसे हुआ मां गंगा का उद्भव

विष्णु आदि पुराणों के अनुसार गंगा का उद्भव भगवान विष्णु के बायें पैर के अंगूठे के नख से बताया गया है। कुछ अन्य पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार भगवान शंकर की जटाओं से निकल कर गंगा सात धाराओं में परिवर्तित हो गई। इनमें तीन धाराएं- ‘नलिनी’, ‘हलदिनी’, ‘पावनी’ पूर्व की ओर हैं। ‘सीता’, ‘सुचक्षु’, ‘सिंधु’ पश्चिम की ओर हैं। सातवीं धारा ‘भगीरथी’ हैं। कूर्म पुराण के अनुसार गंगा सबसे पहले ‘सीता’, ‘अलकनंदा’, ‘सुचक्षु’ और ‘भद्रा’ के रूप में चार धाराओं में बहती है।

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गंगा को क्यों कहते हैं त्रिपथगा

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गंगा के जन्म के संबंध में पुराणों में अनेक कथाएं हैं। एक मान्यतानुसार भगवान विष्णु के वामन रूप में राक्षस बलि के प्रभुत्व से मुक्ति दिलाने के बाद ब्रह्मा ने विष्णु के चरण धोए और उस जल को अपने कमंडल में भर लिया। क अन्य कथानुसार शिव के संगीत को सुनकर विष्णु के शरीर से पसीना निकला, तो उसे ब्रह्मा ने अपने कमंडल में भर लिया और कमंडल के इसी जल से गंगा का जन्म हुआ। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा ‘मंदाकिनी’, पृथ्वी पर ‘गंगा’ और पाताल में ‘भोगवती’ नदी के रूप प्रवाहित हो रही है, इसलिए इसे ‘त्रिपथगा’ भी कहते हैं।

अश्वनी कुमार

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