Ganga Dussehra 2026: कब है गंगा दशहरा, क्यों इसे कहते हैं महाअघतारकम पर्व, सभी पापों को हरती हैं मां गंगा
Ganga Dussehra kab hai: ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाने वाला ‘गंगा दशहरा’ सनातन में शिव और शक्ति के संयोग का पवित्र-पावन पर्व है। गंगा त्रिदेव की कृपासंयुक्त हैं। भगवान शंकर ने इन्हें शुद्ध किया। भगवान विष्णु ने इन्हें उत्पन्न किया।

ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाने वाला ‘गंगा दशहरा’ सनातन में शिव और शक्ति के संयोग का पवित्र-पावन पर्व है। गंगा त्रिदेव की कृपासंयुक्त हैं। भगवान शंकर ने इन्हें शुद्ध किया। भगवान विष्णु ने इन्हें उत्पन्न किया। ब्रह्मा ने इनका उद्गम स्थान स्थापित किया। पितृ तर्पण हेतु राजा भगीरथ इन्हें पृथ्वी पर लेकर आए।
क्यों कहते हैं गंगा दशहरा को महाअघतारकम पर्व
वेदों में गंगा को ‘अप:सती’ कहते हैं अर्थात जो सृष्टि की रक्षा करती है। गंगा हमारी आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ बिंदु है। यह गंगोत्री से गंगासागर तक वैसे ही यात्रा करती है, जैसे मनुष्य अपने जीवनकाल में पुरुषार्थ चतुष्ट्य और आश्रम व्यवस्था से गुजरता है। आध्यात्मिक चेतना की माता गायत्री की ‘गायत्री जयंती’ भी इसी दिन मनाई जाती है। गंगा दशहरा पर गंगा का पूजन करने से मां गंगा व्यक्ति का बड़ा से बड़ा पाप समाप्त कर देती है, इसलिए इसे शास्त्रों में ‘महाअघतारकम’ पर्व कहा गया है। इस साल गंगा दशहरा 25 मई को मनाया जाएगा।
किन पापों का होता है निवारण
यह मनुष्य के अंतर्मन के विकार अर्थात ईर्ष्या, काम-क्रोध, लोभ जैसी मानसिक अशुद्धियों को भी धोने का पर्व है। भौतिक रूप से इससे व्यक्ति को ऋण, व्यसन, रोग, दोष आदि से मुक्ति मिलती है। अन्न, धन-धान्य सभी में अपार वृद्धि होती है। मनुष्य के जीवन के सभी प्रकार के दोष और अमंगल नष्ट हो जाते हैं।मातु गंगा भूत-भावन शिव की जटाओं से पृथ्वी की तरफ जब अपनी यात्रा का प्रारंभ कर हर-हर करती हुई निकलीं, तो उनके साथ सात धाराएं बन गईं। तीन धाराएं नलिनी, हलादिनी व पावनी पश्चिम में, सीता, सुबुक्षु, सिंधु एवं सातवीं धारा भागीरथी है। कूर्म पुराण में है कि सीता, अलकनंदा आदि गंगा की चार धाराएं स्वर्ग में बहती हैं। मंदाकिनी की जो धारा हम धरा पर देखते हैं, वह गंगा है और पाताल में भोगवती के रूप में प्रवाहित होती है।
गंगा क्यों है जीवन दायिनी
व्यावहारिक तौर पर देखें, तो भारत की ऋषि और कृषि संस्कृति के पीछे सबसे बड़ा अवदान इन्हीं नदियों का है। गंगा अपनी सहायक नदियों के साथ पूरे उत्तर भारत को कृषि और आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत ही समुन्नत करती हैं। गंगा के दोआबे में जितनी फसलें पैदा होती हैं, उतनी फसलें पूरे विश्व में कहीं नहीं पैदा होतीं। उपज की दृष्टि से गंगा और इनकी सहायक नदियों में अत्यधिक उर्वरा शक्ति प्रदान करने की शक्ति है।सामाजिक दृष्टि से देखें, तो यहां आकर गंगा ने आवागमन के साधन के रूप में हमारी सभ्यता को विकसित किया। नावों के संचालन के माध्यम से नगरों का निर्माण हुआ, व्यापार हुआ। एक-दूसरे तक अपनी संस्कृति-सभ्यताऔर व्यापार को पहुंचाने के लिए इनका उपयोग किया गया, इसलिए गंगा की सर्वत्र श्रद्धा से पूजा की जाती है, मानो मां बची रहेगी, तो हम बचे रहेंगे। हमारी आगे आने वाली पीढ़ियां बची रहेंगी। गंगा दशहरा का पर्व मनाने के पीछे उनकी पावनता को, उनकी अविरल धारा को और उनके द्वारा जो कुछ हमें प्राप्त हुआ है, जो सभ्यता-संस्कृति का विकास हुआ है, उसे बचाने का भी भाव है।इस अवसर पर हमें उन्हें अविरल रखने हेतु अपने को समर्पित करना चाहिए। इसके साथ भावी पीढ़ी को यह बताना है कि यह जो प्राप्त हुआ है, इसको बचाए रखना भी हमारा ही दायित्व है। धरती पर हम अपने विकास हेतु केवल उतना ही उपयोग करें, जितना हमारी आवश्यकता हो, शेष बचाए भी रखें और नए सृजन करने के लिए भी हमेशा चिंतन भी करते रहें।




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