Quote Of The Day: इन 5 चीजों को समय पर और सही तरीके से अपनाएं, वरना बर्बाद हो जाएगा जीवन, पढ़ें चाणक्य के विचार
चाणक्य कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति के पास धन नहीं होता, तो उसके मित्र, पत्नी, नौकर और अपने लोग भी उसे छोड़ देते हैं। लेकिन जैसे ही उसके पास फिर से धन आ जाता है, वही लोग वापस उसके पास आ जाते हैं। पढ़ें आज के सुविचार…

Aaj Ka Vichar: आचार्य चाणक्य की नीतियां आज भी उतनी ही असरदार और प्रासंगिक मानी जाती हैं। उन्हें महान दार्शनिक, दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ, कुशल राजनीतिज्ञ और श्रेष्ठ अर्थशास्त्री के रूप में जाना जाता है। चाणक्य नीति में उन्होंने जीवन को सफल, सुखी और संतुलित बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण बातें बताई हैं। इस ग्रंथ में समाज में शांति, न्याय और व्यक्ति की उन्नति से जुड़े कई उपयोगी विचार भी मिलते हैं। चलिए उनके 5 ऐसे श्लोक के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनमें जीवन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें बताई है। अगर इन बातों का इंसान अनुसरण कर ले तो वो सफल हो सकता है और एक अच्छा जीवन जी सकता है।
श्लोक 1
धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम्।
सुगृहीतं च कर्त्तव्यमन्यथा तु न जीवति ॥
अर्थ
आचार्य चाणक्य इस श्लोक में कहते हैं कि धर्म, धन, अनाज, गुरु की बात और औषधि, इन 5 चीजों को सबको समय पर और सही तरीके से अपनाना चाहिए। अगर इन्हें ठीक से नहीं लिया जाए, तो जीवन ठीक से नहीं चल पाता। जो व्यक्ति धर्म के कार्यों में लापरवाही करता है, उसे उसका पूरा फल नहीं मिलता। कई बार उसे नुकसान भी उठाना पड़ सकता है और समाज की नाराजगी भी झेलनी पड़ती है। इसी तरह, जो लोग बीमारी से बचने के लिए दी जाने वाली दवाइयों को समय पर नहीं लेते, उनके लिए यह खतरनाक साबित हो सकता है। दवा लेने से पहले उसकी सही जानकारी होना भी जरूरी है। जो व्यक्ति धन का सही उपयोग नहीं करता, वह जल्दी नुकसान में आ जाता है। इसलिए पैसे खर्च करते समय हमेशा समझदारी बरतनी चाहिए। जो लोग अपने गुरु या शिक्षक की बातों को नजरअंदाज करते हैं, उन्हें जीवन में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
श्लोक 2
त्यज दुर्जनसंसर्ग भज साधुसमागमम्।
कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यतः ॥
अर्थ
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बुरे लोगों का साथ छोड़ दें और अच्छे लोगों की संगति करें। दिन-रात अच्छे काम करते रहें और हमेशा याद रखें कि यह जीवन स्थायी नहीं है यानी सब कुछ नश्वर है।
श्लोक 3
एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्।
पृथिव्यां नास्ति तद्ब्रव्यं यद् दत्त्वा चानृणी भवेत्॥
अर्थ
चाणक्य इस श्लोक के जरिए कहते हैं कि जो गुरु अपने शिष्य को एक अक्षर या थोड़ा सा ज्ञान भी सिखाता है, उसके ऋण से मुक्त होना संभव नहीं है। पूरी पृथ्वी पर ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसे देकर उस गुरु का उपकार चुकाया जा सके।
श्लोक 4
खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।
उपानद् मुखभङ्गो वा दूरतैव विसर्जनम् ॥
अर्थ
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि दुष्ट लोगों और कांटों से निपटने के दो ही तरीके होते हैं। पहला या तो उन्हें जूते से कुचल दो या उनसे दूर ही रहो। यानी बुरे लोगों से या तो सख्ती से निपटना चाहिए या उनसे दूरी बना लेना ही बेहतर होता है।
श्लोक 5
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं, दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च।
तं चार्थवन्तं पुनराश्रयन्ते, ह्यर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः॥
अर्थ
चाणक्य कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति के पास धन नहीं होता, तो उसके मित्र, पत्नी, नौकर और अपने लोग भी उसे छोड़ देते हैं। लेकिन जैसे ही उसके पास फिर से धन आ जाता है, वही लोग वापस उसके पास आ जाते हैं।
डिस्क्लेमरः इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।




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