Aaj ka Suvichar: जोंक और अमृत के उदाहरण से समझें संत और असंत का अंतर, पढ़ें आज का सुविचार
aaj ka suvichar 27 march: जब हम बहुत परेशान होते हैं और सही गलत का कुछ भी हमें समझ नहीं आता तो ऐसे में सही गलत की पहचान कैसे करें, इसमें कैसे अंतर करें, यह हमारे लिए जानना बहुत जरूरी होता है।

जब हम बहुत परेशान होते हैं और सही गलत का कुछ भी हमें समझ नहीं आता तो ऐसे में सही गलत की पहचान कैसे करें, इसमें कैसे अंतर करें, यह हमारे लिए जानना बहुत जरूरी होता है। यहां हम आपको रामचरितमानस के कुछ ऐसे श्लोक बताएंगे, जहां से आप समझेंगे कि संत, असंत लोग कैसे होते हैं और इनकी पहचान कैसे करें।
द संत असज्जनन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
बिछरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥
अब मैं संत और असंत दोनों के चरणों की वन्दना करता हूं, इस दुनिया में आपको दोनों मिलेंगें, लेकिन आप उनको कैसे पहचानेंगे। उनमें कुछ अन्तर कहा गया है। वह अंतर यह है कि एकतो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरा मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं। यानी संत जब आपसे दूर जाते हैं, तो आपके लिए प्राण जाने के समान हैं, और असंत जब आपके सामने आते हैं, तो समझ लें कि आपको दुख मिलने वाला है।
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥
सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥
इस दुनिया में दोनों तरह के लोग एक साथ आते हैं। संत और असंत इस जगत में एक साथ पैदा होते हैं। पर कमल और जोंककी तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं। एक तरफ जहां कमल दर्शन और स्पर्श से सुख देता है, किन्तु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है। इसलिए साधु अमृत के समान और असाधु मदिरा के समान । दोनों को उत्पन्न करने वाला अगाध समुद्र एक ही है।
भल अनभल निज निज करतूती । लहत सुजस अपलोक बिभूती॥ सुधा सुधाकर सुरसरि साधू । गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू।।
गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥
भले और बुरे अपनी-अपनी करनी के अनुसार सुन्दर यश और अपयश की सम्पत्ति पाते हैं। इनका गुणगान भी वैसा ही किया गया है। अमृत, चन्द्रमा, गड़ाजी और साधु एवं विष, अग्नि, कलियुगके पापों की नदी अर्थात् कर्मनगाशा और हिंसा करनेवाला व्याध, इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं। किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है। इसलिए यह हमारे ऊपर है कि हम अच्छे चीजें ग्रहण करते हैं या बुरी।
दो०-- भलो भलाइहि पे लहइ लहइ निचाइहि नीचु। सुधा सराहिअ अमरतों गरल सराहिअ मीचु॥ ५॥
भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण किए रहता है। आपको अच्छे बुरे की समझ होनी चाहिए। अमृत की सराहना सिर्फ इसलिए की जाती है वो अमर करता है और विष की मारने में।
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥
इस श्लोक में बताया गया है कि हम सभी लोग इस सृष्टि का हिस्सा हैं। भले, बुरे सभी ब्रह्माके पैदा किए हुए हैं, पर गुण और दोषों को विचारकर वेदों ने उनको अलग-अलग कर दिया है। यहां अच्छाई है, तो बुराई भी। वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण- अवगुणोंसे सनी हुई है।




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