सड़क से सत्ता तक, फिर सियासी पतन; बंगाल में ममता बनर्जी की हार की इनसाइड स्टोरी
West Bengal Chunav Result 2026: सड़क से सत्ता तक का सफर तय करने वाली ममता बनर्जी आज अपनी सबसे बड़ी साख की लड़ाई लड़ रही हैं। जैसे जेठ के मौसम ने अचानक करवट ली, वैसे ही बंगाल की जनता का मिजाज भी बदल गया है। उसी बदलाव का नतीजा है कि ‘दीदी’ का अजेय किला, जिसे कभी कोई नहीं हिला सका था, आज हिल गया है।

West Bengal Chunav Result 2026: सड़क से सत्ता तक का सफर तय करने वाली ममता बनर्जी आज अपनी सबसे बड़ी साख की लड़ाई लड़ रही हैं। जैसे जेठ के मौसम ने अचानक करवट ली, वैसे ही बंगाल की जनता का मिजाज भी बदल गया है। उसी बदलाव का नतीजा है कि 'दीदी' का अजेय किला, जिसे कभी कोई नहीं हिला सका था, आज हिल गया है। 2011 में 34 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत कर बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं 'दीदी' का अजेय किला ढहने के कगार पर पहुंच गया है। 2026 के विधानसभा चुनावी नतीजे बता रहे हैं कि बंगाल में ममता का जादू खत्म होने को है।
छात्र राजनीति से 'जायंट किलर' तक
5 जनवरी 1955 को कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में जन्मी ममता बनर्जी ने अपनी आक्रामक छवि का परिचय बहुत जल्दी दिया। 18 साल की उम्र में आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़कर उन्होंने देशव्यापी चर्चा बटोरी। 1984 में कांग्रेस टिकट पर उन्होंने वामपंथी दिग्गज सोमनाथ चटर्जी को हराकर 'जायंट किलर' का खिताब हासिल कर लिया। संसद में भी उनकी आक्रामकता छुपी नहीं। 1998 में वामपंथी हिंसा के खिलाफ उन्होंने सदन में मानव खोपड़ियां रख दीं। महिला आरक्षण बिल पर बहस के दौरान तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का कॉलर पकड़ लिया। ये घटनाएं उनकी 'स्ट्रीट फाइटर' वाली छवि को मजबूत करती रहीं।
सिंगुर आंदोलन और सत्ता
ममता बनर्जी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा आधार बना 2006 का सिंगुर आंदोलन। टाटा नैनो प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण के विरोध में उन्होंने 26 दिनों का अनशन किया। स्वास्थ्य बिगड़ने के बावजूद अडिग रहीं। इस आंदोलन ने वामपंथी सरकार की जड़ें हिला दीं और 2011 में तृणमूल कांग्रेस भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई। ‘माटी-माटी-मानुष’ के नारे के साथ ममता बनर्जी बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।
अब क्यों टूट रहा है वो किला?
अब सवाल ये है कि जो दुर्ग 34 साल के कम्युनिस्ट शासन को झेल गया, वो महज 15 साल में क्यों दरक गया? 2026 के चुनावी नतीजे इसी सवाल को उठा रहे हैं। सियासी पंडितों के अनुसार, ममता की वही आक्रामकता जो कभी ताकत थी, आज एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता-विरोधी लहर) का सबसे बड़ा कारण बन गई है। इसकी मुख्य वजहें हैं...
भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
शिक्षक भर्ती घोटाला (SSC Scam) में पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी और उनके करीबियों के पास से बरामद करोड़ों की नकदी ने पार्टी की छवि को गहरा झटका दिया। मवेशी तस्करी में अनुब्रत मंडल और राशन घोटाले में ज्योतिप्रिय मल्लिक जैसे कद्दावर नेताओं की गिरफ्तारी ने जनता को संदेश दिया कि भ्रष्टाचार पार्टी के हर स्तर तक फैला हुआ है।
सिंडिकेट राज और 'कट मनी'
भवन निर्माण, सरकारी ठेकों, राहत राशि और आवास योजनाओं में 10 से 25 प्रतिशत तक कट मनी की वसूली आम बात हो गई। ममता ने खुद कार्यकर्ताओं को पैसा लौटाने की नसीहत दी, लेकिन तब तक 'माटी-मानुष' का भरोसा पूरी तरह खोखला हो चुका था।
बीजेपी की घेराबंदी और आक्रामक रणनीति
बीजेपी ने बंगाल को 'मिशन' बना लिया। बूथ स्तर तक माइक्रो मैनेजमेंट, केंद्रीय मंत्रियों की फौज और 'मुस्लिम तुष्टिकरण' वाले नैरेटिव ने हिंदू वोटों को एकजुट किया। केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई ने TMC के वित्तीय और चुनावी तंत्र को कमजोर कर दिया।
संदेशखाली, आरजी कर और महिलाओं का टूटा भरोसा
ममता का सबसे मजबूत वोट बैंक महिलाएं रही हैं। लेकिन संदेशखाली में महिलाओं पर हुए अत्याचार और आरजी कर अस्पताल में डॉक्टर के साथ हुई घटना के बाद प्रशासनिक लापरवाही ने इस आधार को हिला दिया। 'मां-माटी-मानुष' का नारा देने वाली सरकार जब अपनी बेटियों की सुरक्षा नहीं कर सकी, तो महिलाओं का बड़ा हिस्सा छिटक गया।
पार्टी के अंदर कलह और बगावत
इन सबके अलावा सबसे बड़ी वजह टिकट वितरण के समय पुराने बनाम नए नेताओं की लड़ाई खुलकर सामने आ गई। सुभेंदु अधिकारी जैसे कई अहम नेताओं का जाना या निष्क्रिय होना संगठन की कमजोरी बन गया। जिसका परिणाम आज सबके सामने है।




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