calcutta high court cancels ECI order professors poll duty west bengal election जजों को भी लगा दो... चुनाव आयोग की 'मनमानी' पर HC की फटकार; बंगाल में प्रोफेसर नहीं संभालेंगे बूथ, West-bengal Hindi News - Hindustan
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जजों को भी लगा दो... चुनाव आयोग की 'मनमानी' पर HC की फटकार; बंगाल में प्रोफेसर नहीं संभालेंगे बूथ

हाईकोर्ट ने बंगाल चुनाव में असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफेसरों को पीठासीन अधिकारी बनाने के चुनाव आयोग (ECI) के आदेश को खारिज कर दिया है। जानें कोर्ट ने क्या अहम टिप्पणियां कीं और क्यों लगी EC के फैसले पर रोक।

Sat, 18 April 2026 09:13 AMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, कोलकाता
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जजों को भी लगा दो... चुनाव आयोग की 'मनमानी' पर HC की फटकार; बंगाल में प्रोफेसर नहीं संभालेंगे बूथ

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कोलकाता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) को तगड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने आयोग की उस अधिसूचना को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसमें सरकारी कॉलेजों के असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफेसरों को मतदान केंद्रों पर पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया था। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग पर दिशानिर्देशों में बार-बार बदलाव का आरोप लगाते हुए साफ कहा कि बिना किसी ठोस कारण या असाधारण परिस्थितियों के प्रोफेसरों को इस जिम्मेदारी पर नहीं लगाया जा सकता। जस्टिस कृष्णा राव की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनाव आयोग यह साबित करने में विफल रहा है कि इन उच्च पदस्थ शिक्षकों की इस पद पर तैनाती 'अत्यंत आवश्यक' क्यों थी।

मामला क्या था?

सरकारी कॉलेजों के असिस्टेंट प्रोफेसरों ने आगामी विधानसभा चुनावों में उन्हें पीठासीन अधिकारी बनाए जाने के चुनाव आयोग के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चुनाव आयोग के ही दिशा-निर्देशों के अनुसार, 'ग्रुप-ए' समकक्ष अधिकारियों (जिसमें टीचिंग स्टाफ शामिल है) को मतदान केंद्र की ड्यूटी पर तब तक तैनात नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि ऐसी 'अपरिहार्य परिस्थितियां' न हों, जिन्हें लिखित रूप में दर्ज किया गया हो।

अदालत की सुनवाई और टाइमलाइन

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने इस मामले में चुनाव आयोग को अपनी बात साबित करने के कई मौके दिए। 13 अप्रैल को हाईकोर्ट ने पहली बार मामले की सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग से वे रिकॉर्ड पेश करने को कहा, जिनमें यह दर्ज हो कि किन अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण इन प्रोफेसरों की नियुक्ति की गई है। 16 अप्रैल को चुनाव आयोग अदालत में कोई भी दस्तावेज पेश करने में विफल रहा और उसने और समय मांगा। अदालत ने उन्हें शुक्रवार तक का समय दिया। शुक्रवार को अंतिम सुनवाई के दिन अदालत ने पाया कि चुनाव आयोग अपने ही फरवरी 2010 के सर्कुलर का पालन करने में विफल रहा है, जिसमें ग्रुप-ए के अधिकारियों की नियुक्ति के लिए लिखित कारण बताना अनिवार्य है।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

जस्टिस कृष्णा राव ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अधिकारियों ने ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि किन्हीं अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण याचिकाकर्ताओं को मतदान केंद्र में पीठासीन अधिकारी नियुक्त करने का निर्णय लिया गया। अदालत ने जोर देकर कहा कि अधिकारियों की नियुक्ति करने की चुनाव आयोग की शक्ति असीमित नहीं है और उसे अपने ही आदेशों का पालन करना चाहिए। अदालत ने आदेश दिया कि बिना किसी पूर्व निर्णय या उचित कारण के की गई इन नियुक्तियों को रद्द किया जाता है।

हाईकोर्ट की फटकार: सिर्फ प्रोफेसर क्यों, जजों को भी लगा दो

सुनवाई के दौरान जस्टिस राव ने चुनाव आयोग को खासी फटकार लगाई। उन्होंने पूछा, 'आप जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 26 के तहत जजों को भी मतदान अधिकारी बना सकते हैं। मैं खुद जाने के लिए तैयार हूं।' जज ने आगे कहा, 'यह कोई मजाक नहीं है। हर बार आप अपने दिशानिर्देश बदलते रहते हैं, लेकिन कोई स्पष्ट या पारदर्शी अधिसूचना जारी करने में विफल रहते हैं।' कोर्ट ने आयोग के 2010 के दिशानिर्देशों का हवाला दिया, जिसमें साफ लिखा है कि विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के शिक्षण कर्मचारियों सहित ‘ग्रुप-ए’ के समकक्ष वरिष्ठ अधिकारियों को मतदान केंद्रों पर ड्यूटी नहीं दी जानी चाहिए, जब तक कि जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) विशेष कारण लिखित रूप में दर्ज न करें। आयोग ने 2023 में नए दिशानिर्देश जारी किए थे, लेकिन कोर्ट ने कहा कि इनमें भी असाधारण परिस्थितियों का जिक्र जरूरी है, जो आयोग पेश नहीं कर सका।

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दोनों पक्षों की दलीलें

चुनाव आयोग का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सौम्य मजूमदार ने तर्क दिया कि 7 जून, 2023 के एक नए सर्कुलर ने पुराने निर्देशों की जगह ले ली है। राज्य में लगभग 90,000 बूथों पर चुनाव होने हैं, इतने बड़े स्तर पर हमेशा अधिकारियों के पद और वेतनमान का कड़ाई से पालन करना संभव नहीं होता। यह भी दावा किया गया कि याचिका देर से दायर की गई है और यह केवल ड्यूटी से बचने का एक तरीका है।

याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि यह मुख्य रूप से प्रक्रिया का उल्लंघन है। आयोग ग्रुप-ए के अधिकारियों को ड्यूटी पर लगाने से पहले विशिष्ट कारण दर्ज करने के लिए बाध्य है। उन्होंने एक विसंगति की ओर इशारा किया कि टाइपिस्ट और स्टेनोग्राफर जैसे निचले रैंक के कर्मचारियों को 'सेक्टर अधिकारी' (जो पीठासीन अधिकारी से ऊपर होता है) बनाया गया है, जबकि प्रोफेसरों को पीठासीन अधिकारी नियुक्त कर दिया गया। यह आयोग के ही पद और वेतनमान के दिशा-निर्देशों का सीधा उल्लंघन है।

जब कोर्ट ने पूछा कि इस फैसले से चुनाव प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा, तो भट्टाचार्य ने आश्वासन दिया कि चुनाव आयोग के पास अधिकारियों का एक बहुत बड़ा 'रिजर्व पूल' होता है, इसलिए चुनाव प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं आएगी।

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अदालत का अंतिम आदेश और दी गई छूट

हालांकि अदालत ने नियुक्तियों को रद्द कर दिया है, लेकिन चुनाव प्रक्रिया को सुचारू रखने के लिए कुछ स्पष्टीकरण और छूट भी दी हैं। यह आदेश उन प्रोफेसरों पर लागू नहीं होगा जो पहले ही चुनाव आयोग के आदेशानुसार ट्रेनिंग ले चुके हैं और स्वेच्छा से अपनी ड्यूटी करने के इच्छुक हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग अभी भी स्वतंत्र है कि वह याचिकाकर्ताओं (प्रोफेसरों) को उनके पद, वेतन और स्थिति के अनुरूप और लागू दिशा-निर्देशों के अनुसार नई चुनावी जिम्मेदारियां सौंप सकता है।