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उत्तराखंड की जनजातियों को UCC से जुड़ने की आजादी, फायदे के साथ ये आशंकाएं भी

उत्तराखंड की जनजातियों को यूसीसी कानून से जुड़ने की स्वैच्छिक आजादी की तैयारी की जा रही है। अगर एसटी समुदाय यूसीसी से जुड़ जाता है तो इसके अनेकों फायदे हैं, लेकिन समुदाय में कुछ चिंता भी है।

Wed, 8 Oct 2025 10:09 AMGaurav Kala विनोद मुसान, हिन्दुस्तान, देहरादून
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उत्तराखंड की जनजातियों को UCC से जुड़ने की आजादी, फायदे के साथ ये आशंकाएं भी

उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से अनुसूचित जनजातियों (एसटी) को बाहर रखा गया है। लेकिन अब राज्य सरकार उन्हें स्वैच्छिक रूप से इसमें शामिल करने की तैयारी कर रही है। एसटी वर्ग के कुछ प्रतिनिधियों ने सरकार को प्रत्यावेदन देकर इसकी पैरवी की है। इससे एसटी वर्ग के लोग भी यूसीसी पोर्टल पर ऑनलाइन सुविधा का लाभ लेते हुए विवाह पंजीकरण करा सकेंगे और दूसरे प्रमाण पत्र हासिल कर सकेंगे। इससे उन्हें तमाम तरह के सरकारी कामों में भी आसानी होगी, लेकिन कुछ आशंकाएं भी बढ़ गई हैं।

सूत्रों के अनुसार इन प्रत्यावेदन में कहा गया है कि विवाह पंजीकरण, विदेश यात्रा करने और अन्य सरकारी प्रक्रिया से जुड़े कार्यों को पूरा करने में दिक्कतें आती हैं। अलग कानूनी प्रावधानों के चलते कई बार इन प्रक्रियाओं में देरी या विवाद की स्थिति बन जाती है। मालूम हो कि राज्य में प्रमुख रूप से थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा और राजी जनजातियां निवास करती हैं।

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फिलहाल ये जनजातियां इस कानून के दायरे से बाहर हैं। आने वाले दिनों यदि वे चाहें तो यूसीसी के प्रावधानों को अपनाने का विकल्प उनके पास होगा। शासन के सूत्रों के अनुसार, यूसीसी में शामिल होने के बाद भी उनके पारंपरिक अधिकार और परंपरागत व्यवस्थाएं सुरक्षित रहेंगी। यानी विवाह, उत्तराधिकार या सामाजिक रीति-रिवाजों से जुड़े उनके अधिकारों पर कोई आंच नहीं आएगी।

यूसीसी नियमावली क्रियान्वयन समिति के अध्यक्ष रहे और उत्तराखंड के पूर्व मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह ने कहा कि बेशक जनजातियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा गया है, मगर उत्तराखंड में कोई भी जनजाति स्वैच्छा से यूसीसी में शामिल होती है तो निश्चित तौर उन्हें इसका फायदा होगा। उत्तराखंड अनुसूचित जनजाति आयोग के सचिव योगेंद्र सिंह रावत का कहना है कि शासन में इस मुद्दे पर चर्चा को लेकर आयोग के पदाधिकारियों को बुलाया गया था, लेकिन अभी विस्तृत बातचीत नहीं हो पाई है। अभी उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता से अनुसूचित जनजातियों को बाहर रखा गया है।

इस मसले पर अपर सचिव गृह निवेदिता कुकरेती ने कहा कि यह व्यापक अध्ययन का विषय है। इस पर फिलहाल होमवर्क किया जा रहा है। राज्य में निवास करने वाली सभी जनजातियों से विस्तृत विमर्श के बाद ही इस पर सरकार आगे बढ़ेगी। शीघ्र ही इस संबंध में समाज के लोगों से चर्चा की जाएगी।

आशंकाएं

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू होने के बाद समाज के विभिन्न वर्गों में कुछ आशंकाएं भी सामने आई हैं। पारंपरिक रीति-रिवाजों और स्थानीय परंपराओं पर असर पड़ने की चिंता जताई जा रही है। खासकर अलग-अलग समुदायों और जनजातीय क्षेत्रों में यह डर है कि उनकी सांस्कृतिक पहचान कहीं कमजोर न पड़ जाए। इसके अलावा समाज के भीतर इस बदलाव पर सहमति बनाने की चुनौती भी सरकार और प्रशासन के सामने बनी हुई है।

फायदे क्या हैं

वहीं, इसके कई फायदे भी गिनाए जा रहे हैं। ऑनलाइन विवाह पंजीकरण जैसे प्रावधानों से सरकारी प्रक्रियाएं और दस्तावेजी कामकाज आसान होंगे। समान नागरिक संहिता लागू होने से कानूनी दिक्कतें और भ्रम कम होंगे, जिससे नागरिकों के अधिकार और जिम्मेदारियां स्पष्ट होंगी। प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ेगी और आम लोगों को सरकारी सेवाओं का लाभ अधिक तेज़ी और सुविधा से मिल सकेगा।

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