गंगा का ‘आंचल’ मैला कर रहीं उसकी सहायक नदियां, रिपोर्ट में खतरे की घंटी
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट कहती है कि उत्तराखंड में गंगा की 12 सहायक नदियां गंगा को मैला कर रही हैं। रिपोर्ट बेहद चिंता पैदा करने वाली है। रिपोर्ट में देहरादून की सुसवा, सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी की श्रेणी में है।

गंगा में सीधे या किसी और नदी के साथ मिलकर मिलने वाली उत्तराखंड की नदियां उसे प्रदूषित कर रही हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने अपनी रिपोर्ट में राज्य की 12 नदियों को प्रदूषित बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, नदियों में प्रदूषण की मुख्य वजह उनमें, सीवर और उद्योगों की गंदगी जाना बताया गया। इससे इनकी जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) का स्तर निर्धारित मानकों से कहीं अधिक पाया गया। सीपीसीबी ने उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने को वर्किंग प्लान बनाने को कहा है।
सीपीसीबी ने बताया है कि बिना उपचारित सीवेज (मल-जल) और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला अपशिष्ट नदियों के प्रदूषण का प्रमुख कारण बना है। कई शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में मल-जल सीधे नदियों में बहाया जा रहा है, जबकि कई जगह सीवेज शोधन संयंत्र (एसटीपी) व औद्योगिक अपशिष्ट शोधन संयंत्र (ईटीपी) मानकों के अनुरूप कार्य नहीं कर रहे हैं। साॅलिड वेस्ट का सही निस्तारण न होना भी एक बड़ी वजह है। रिपोर्ट में दून की सुसवा, सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी की श्रेणी में है। इसमें मुख्य रूप से रिस्पना और बिंदाल नदियों के जरिए शहरभर का गंदा पानी और सीवर सीधे जा रहा है। यूएसनगर की बाणगंगा, भेला, ढेला, कल्याणी नदियों को भी सबसे प्रदूषित की श्रेणी में रखा गया है।
सर्वाधिक प्रदूषित
उत्तराखंड में सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में सुसवा, भेला, ढेला और कल्याणी नदी शामिल हैं। देहरादून के मोथरोवाला क्षेत्र में सुसवा नदी घरेलू सीवर और नालों का गंदा पानी सीधे मिलने से बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी है। वहीं काशीपुर से लोहिया पुल तक भेला नदी और ठाकुरद्वारा–अलीगंज मार्ग से आदमपुर तक ढेला नदी में औद्योगिक अपशिष्ट, शहरी कचरा और कृषि रसायनों के कारण जल गुणवत्ता बेहद खराब हो गई है। इसके अलावा पंतनगर औद्योगिक क्षेत्र के आसपास कल्याणी नदी पर फैक्ट्रियों से निकलने वाले रसायनयुक्त पानी का भारी दबाव है, जिससे इन नदियों का पारिस्थितिक संतुलन गंभीर खतरे में पड़ गया है।
मध्यम प्रदूषित
उत्तराखंड में मध्यम प्रदूषित नदियों में टोंस, किच्छा, कोसी और पिलखार नदी शामिल हैं। विकासनगर के हरिपुर क्षेत्र में टोंस नदी तथा किच्छा से पुल बट्टा तक किच्छा नदी घरेलू सीवर, स्थानीय नालों और कृषि अपशिष्ट के कारण मध्यम स्तर का प्रदूषण झेल रही हैं। इसी तरह बाजपुर मार्ग पुल से डड्याल पुल तक कोसी नदी पर शहरी विस्तार और औद्योगिक गतिविधियों का असर दिखाई देता है, जबकि बिलासपुर से रामपुर भोट तक पिलखार नदी में कृषि रसायन और आबादी से निकलने वाला अपशिष्ट मिल रहा है, जिससे इन नदियों की जल गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और भविष्य को लेकर चिंता बढ़ रही है।
कम प्रदूषित, लेकिन चिंताजनक
उत्तराखंड में कम प्रदूषित नदियों में रामगंगा और यमुना नदी शामिल हैं। कालागढ़ बैराज से बिजनौर तक रामगंगा नदी अभी अपेक्षाकृत कम प्रदूषित है, लेकिन बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिक गतिविधियों और मानवीय हस्तक्षेप के कारण इसके जल की गुणवत्ता पर धीरे-धीरे दबाव बढ़ रहा है। वहीं डाकपत्थर क्षेत्र में यमुना नदी फिलहाल काफी हद तक स्वच्छ मानी जाती है, परंतु पर्यटन, आबादी और विकास गतिविधियों में तेजी आने से भविष्य में इसके प्रदूषण का खतरा बना हुआ है, जिसे देखते हुए समय रहते संरक्षण के ठोस कदम उठाना जरूरी है।
कुछ एसटीपी मानकों पर खरे
हाल में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने प्रदेश में चल रहे 70 एसटीपी से शोधन के बाद निकलने वाले जल की सैंपलिंग की थी, जिनमें से 10 का पानी प्रदूषित मिला। जबकि बाकियों का मानक के आसपास था। केवल कुछ एसटीपी का ही मानकों पर खरा उतरा।
सीपीसीबी ने ये सुझाव दिए
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए कई अहम सुझाव दिए हैं। बोर्ड का कहना है कि घरेलू मल-जल को सीधे नदियों में जाने से रोका जाए, इसके लिए शोधन संयंत्रों की क्षमता बढ़ाकर उनकी नियमित और सख्त निगरानी की जाए। साथ ही औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। सीपीसीबी ने यह भी सुझाव दिया है कि नदी तटों से अतिक्रमण हटाकर वहां हरित क्षेत्र विकसित किए जाएं, ताकि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और पर्यावरणीय संतुलन को सुरक्षित रखा जा सके।
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