Why is Shankaracharya writing, Magh Mela administration notice to Avimukteshwaranand, demands reply within 24 hours शंकराचार्य क्यों लिख रहे? अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस, 24 घंटे में मेला प्रशासन ने जवाब मांगा, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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शंकराचार्य क्यों लिख रहे? अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस, 24 घंटे में मेला प्रशासन ने जवाब मांगा

प्रयागराज माघ मेले में स्नान के दौरान विवाद नए मोड़ पर पहुंच गया। प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को नोटिस भेजकर पूछा है कि आप अपने नाम के साथ शंकराचार्य क्यों लिखते हैं। 24 घंटे में उनसे जवाब मांगा गया है।

Tue, 20 Jan 2026 01:51 PMYogesh Yadav लाइव हिन्दुस्तान
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शंकराचार्य क्यों लिख रहे? अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस, 24 घंटे में मेला प्रशासन ने जवाब मांगा

प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को एक नोटिस जारी कर उनके 'शंकराचार्य' पद के उपयोग पर सवाल उठाए हैं। इस नोटिस के बाद संत समाज और प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। दो दिन पहले माघ पूर्णिमा पर स्नान को लेकर अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच विवाद गहरा गया था। अविमुक्तेश्वरानंद बिना स्नान किए ही लौट आए थे और प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए अनशन शुरू कर दिया था। प्रशासन ने भी अपनी तरफ से सफाई दी थी। इस बीच नोटिस ने मामले में नया मोड़ ले लिया है।

माघ मेला प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक मामले का हवाला देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजकर पूछा है कि वे अपने नाम के आगे 'शंकराचार्य' क्यों लिखते हैं? प्रशासन ने उनसे इस पद की वैधानिकता और उससे जुड़े प्रमाण मांगे हैं। नोटिस में कहा गया है कि वे 24 घंटे के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करें और जवाब दाखिल करें।

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अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती स्नान से रोकने के विरोध में अपने शिविर में नहीं गए हैं और इसी बीच प्रयागराज मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष ऋषिराज की ओर से उन्हें नोटिस दिया गया है। दिए गए नोटिस में कहा गया है कि उन्होंने अपने शिविर में लगे बोर्ड पर ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य शब्द का इस्तेमाल किया है जबकि ज्योतिष्पीठ के शांकराचार्य को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

वर्ष 2020 की अपील का हवाला देकर कहा गया है कि मामला अब तक विराचाधीन है। ऐसे में उच्चतम न्यायालय के अंतिम आदेश आए बिना या फिर कोर्ट से यह गाइड लाइन मिले बिना की किसके पक्ष में पट्टाभिषेक होगा, शंकराचार्य लिखना न्यायालय के आदेश की अवहेलना माना जाएगा। प्रशासन ने उन्हें नोटिस देकर 24 घंटे में ऐसा करने के लिए जवाब मांगा है।

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अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती स्नान से रोकने के विरोध में अपने शिविर में नहीं गए हैं और इसी बीच प्रयागराज मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष ऋषिराज की ओर से उन्हें नोटिस दिया गया है। दिए गए नोटिस में कहा गया है कि उन्होंने अपने शिविर में लगे बोर्ड पर ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य शब्द का इस्तेमाल किया है जबकि ज्योतिष्पीठ के शांकराचार्य को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

वर्ष 2020 की अपील का हवाला देकर कहा गया है कि मामला अब तक विराचाधीन है। ऐसे में उच्चतम न्यायालय के अंतिम आदेश आए बिना या फिर कोर्ट से यह गाइड लाइन मिले बिना की किसके पक्ष में पट्टाभिषेक होगा, शंकराचार्य लिखना न्यायालय के आदेश की अवहेलना माना जाएगा। प्रशासन ने उन्हें नोटिस देकर 24 घंटे में ऐसा करने के लिए जवाब मांगा है।

बता दें कि स्वामी अविमुक्तेवरानंद सरस्वती की पालकी को मौनी अमावस्या के अवसर पर रोके जाने के बाद से यह विरोध चल रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती स्नान नहीं कर सके थे और उन्होंने आरोप लगाया था कि उनके दर्जनभर से अधिक शिष्यों को पुलिस अफसरों ने जमकर पीटा था। उन्हें पुलिस के लोगों ने संगम तट से हटा दिया और जहां छोड़ा है, वो वहीं रहेंगे।

इसके बाद मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल और पुलिस आयुक्त जोगेंद्र कुमार ने कहा था कि पीटा किसी को नहीं गया है। कुछ लोग पुलिस अफसरों से बदसलूकी कर रहे थे, उन्हें मौके से हटाया गया है। मेलाधिकारी ऋषिराज ने नोटिस की पुष्टि करते हुए कहा कि यह नोटिस पूरी तरह से सही है और उच्चतम न्यायालय में यह मामला विचाराधीन है।

शिविर में मची खलबली

नोटिस मिलने के बाद अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर और उनके समर्थकों में भारी आक्रोश है। उनके करीबियों का कहना है कि यह सनातन परंपरा और पीठ की मान्यताओं पर सीधा प्रहार है। शंकराचार्य के अनुयायियों का तर्क है कि पीठ की परंपराएं शास्त्रों और धार्मिक नियमों से तय होती हैं, न कि प्रशासनिक नोटिसों से।

विवाद बढ़ने की आशंका

मेला प्रशासन ने इस मामले में 24 घंटे की समय सीमा तय की है। यदि तय समय में जवाब नहीं दिया जाता है, तो प्रशासन उनके शिविर या अन्य सुविधाओं को लेकर कड़े कदम उठा सकता है। माघ मेले जैसे धार्मिक आयोजन में किसी शीर्ष संत को इस तरह का नोटिस दिया जाना दुर्लभ माना जा रहा है, जिससे आने वाले दिनों में विवाद और बढ़ने के आसार हैं।

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