42 साल की लीज पर दी जाएंगी 6 लघु जल विद्युत परियोजनाएं, इंजीनियरों का विरोध, योगी से हस्तक्षेप की मांग
यूपी की छह लघु जल विद्युत परियोजनाएं निजी क्षेत्र को 42 साल की लीज पर दी जाएंगी। राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड ने टेंडर फ्लोट कर दिया है और प्रीबिड मीटिंग तीन मार्च को रखी गई है। विद्युत परियोजनाओं को निजी क्षेत्र में दिए जाने का एआईपीईएफ ने विरोध किया है।

यूपी की छह लघु जल विद्युत परियोजनाएं निजी क्षेत्र को 42 साल की लीज पर दी जाएंगी। राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड ने टेंडर फ्लोट कर दिया है और प्रीबिड मीटिंग तीन मार्च को रखी गई है। विद्युत परियोजनाओं को निजी क्षेत्र में दिए जाने का ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) ने विरोध किया है।
टेंडर की शर्तों के मुताबिक निजी कंपनियों को 1.5 करोड़ रुपये प्रति मेगावॉट के अग्रिम प्रीमियम पर इन परियोजनाओं का संचालन नियंत्रण 42 वर्षों के लिए दिया जाएगा। छह परियोजनाओं में भोला (2.7 मेगावॉट), सलावा (3 मेगावॉट), निर्गजनी (5 मेगावॉट), चित्तौरा (3 मेगावॉट), पलरा (0.6 मेगावॉट) और सुमेरा (1.5 मेगावॉट) शामिल हैं। सभी परियोजनाएं ऊपरी गंगा नहर पर स्थित हैं और तकरीबन 90 से 97 साल पुरानी हैं।
कम दिखाई गई क्षमता
परियोजनाओं को निजी क्षेत्रों में दिए जाने की मुखालफत शुरू हो गई है। एआईपीईएफ चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने कहा कि टेंडर में परियोजनाओं की कुल स्थापित क्षमता 15.5 मेगावॉट के स्थान पर 6.3 मेगावॉट दिखाई गई है। इसी आधार पर लगभग 10 करोड़ रुपये में राज्य की मूल्यवान परिसंपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही है। ये परियोजनाएं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उन क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां भूमि का मूल्य बहुत अधिक है। टेंडर में परियोजनाओं के साथ पर्याप्त भूमि भी दी जाएगी। आशंका है कि 42 वर्षों की लंबी लीज अवधि के दौरान निजी कंपनियां न केवल विद्युत उत्पादन से लाभ अर्जित करेंगी, बल्कि परियोजना की भूमि का व्यावसायिक उपयोग भी कर सकती हैं। इतनी अवधि के बाद परिसंपत्तियों की मूल स्थिति में वापसी भी संदिग्ध ही रहेगी।
थोड़े निवेश से सुधर सकती है स्थिति
शैलेंद्र दुबे के मुताबिक, परियोजनाओं का आधुनिकीकरण किया जा सकता है। चूंकि सभी परियोजनाएं ऊपरी गंगा में हैं, लिहाजा साल भर पानी रहने की वजह से पूरे साल भर विद्युत उत्पादन संभव है। अगर सीमित निवेश किया जाए तो परियोजनाओं का आधुनिकीकरण किया जा सकता है और इस खर्च को साल भर में ही विद्युत उत्पादन से वसूला जा सकता है। फेडरेशन ने पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन पर निजीकरण को बढ़ावा देने और राज्य की सार्वजनिक संपत्तियों को औने-पौने दाम पर हस्तांतरित करने के प्रयास का आरोप लगाया है।
मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग
एआईपीईएफ ने इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन ने कहा कि मुख्यमंत्री टेंडर निरस्त करें ताकि सार्वजनिक संपत्तियों और जनहित की रक्षा हो सके। परियोजनाओं का पुनरुद्धार, नवीनीकरण और आधुनिकीकरण सरकारी क्षेत्र में ही कराया जाए।




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