यूपी पंचायत चुनाव समय पर कराना चुनौती, अप्रैल-मई में कराने में क्या आ सकती है अड़चन?
ओबीसी आरक्षण को लेकर शासन की धीमी गति ने उन संभावित उम्मीदवारों की धड़कनें बढ़ा दी हैं जो चुनावी रण में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि अगर अगले कुछ दिनों में आरक्षण के लिए आयोग का गठन नहीं हुआ तो समय पर चुनाव कराने की संभावना कम हो जाएगी।

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की आहट के बीच एक बड़ी प्रशासनिक अड़चन सामने आ रही है। राज्य निर्वाचन आयोग अपनी तैयारियों को तेजी से अंतिम रूप दे रहा है, लेकिन कानूनी और तकनीकी प्रक्रियाओं के चलते चुनाव समय पर कराना एक बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए पंचायत चुनाव को अप्रैल-मई 2026 में कराना चुनौती बनता जा रहा है। ओबीसी आरक्षण को लेकर शासन की धीमी गति ने उन संभावित उम्मीदवारों की धड़कनें बढ़ा दी हैं जो चुनावी रण में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि अगर अगले कुछ दिनों में आरक्षण के लिए आयोग का गठन नहीं हुआ तो समय पर चुनाव कराने की संभावना कम हो जाएगी और प्रशासन को चुनाव टालने के लिए विवश होना पड़ेगा।
राज्य निर्वाचन आयोग की तैयारी अपनी पटरी पर चल रही है। आयोग के कार्यक्रम के अनुसार, पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची 6 फरवरी को जारी कर दी जाएगी। सूची का पुनरीक्षण और डिजिटल डेटा प्रबंधन का कार्य लगभग पूरा हो चुका है। लेकिन, असली समस्या शासन के स्तर पर अटकी हुई है। चुनाव की अधिसूचना जारी करने से पहले सीटों का ओबीसी (OBC) आरक्षण तय होना अनिवार्य है। इसके लिए अब तक 'समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग' का गठन नहीं हो सका है।
ढाई महीने से शासन की मंजूरी का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए 'ट्रिपल टेस्ट' की प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य है। इसके लिए एक समर्पित आयोग का गठन करना होता है जो पिछड़ों की स्थिति का सर्वे कर आरक्षण की सीमा तय करता है। जानकारी के अनुसार, पंचायती राज निदेशालय की ओर से आयोग गठन का प्रस्ताव करीब ढाई महीने पहले ही शासन को भेजा जा चुका है। इसके बावजूद, अब तक शासन स्तर पर इस फाइल को मंजूरी नहीं मिली है।
सर्वे में लगेगा समय
यदि सरकार आज भी आयोग का गठन करती है, तो उसे प्रदेश के सभी जिलों में ओबीसी आबादी का डेटा जुटाने और उसकी समीक्षा करने में कम से कम दो से तीन महीने का समय लगेगा।
आरक्षण प्रक्रिया
आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के वार्डों के लिए आरक्षण का ड्राफ्ट तैयार होगा और उस पर आपत्तियां मांगी जाएंगी।
अप्रैल-मई का समय
यदि आरक्षण प्रक्रिया में और देरी हुई, तो चुनाव प्रक्रिया अप्रैल-मई तक जाएगी। यह समय उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी, फसलों की कटाई और बोर्ड परीक्षाओं का होता है, जिससे मतदान कर्मियों और संसाधनों का प्रबंधन करना प्रशासन के लिए कड़ी चुनौती साबित होगा।
फर्जी वोटिंग पर इस बार नकेल
चुनाव प्रक्रिया में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव 'फेसियल रिकग्निशन सिस्टम' के रूप में देखने को मिलेगा। इस तकनीक के लागू होने से मतदान केंद्रों पर मतदाताओं के चेहरे की पहचान की जाएगी। आयुक्त आरपी सिंह ने स्पष्ट किया कि इस प्रणाली के आने से फर्जी मतदान पर पूरी तरह लगाम लगेगी। यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे के नाम पर वोट डालने की कोशिश करेगा, तो सिस्टम तुरंत उसे पकड़ लेगा।
इसके साथ ही आयोग ने निर्णय लिया है कि प्रदेश के प्रत्येक पंचायत मतदाता को एक विशिष्ट 'स्टेट वोटर नंबर' आवंटित किया जाएगा। यह नंबर मतदाता की पहचान को विशिष्ट बनाएगा और डेटा प्रबंधन में त्रुटियों की संभावना को खत्म करेगा। इससे एक ही व्यक्ति का नाम दो अलग-अलग क्षेत्रों की सूची में होने जैसी समस्याओं का समाधान हो सकेगा।




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