यूपी में विधानसभा के बाद होंगे पंचायत चुनाव, प्रधानों के प्रशासक बनने से भाजपा-सपा को कैसी राहत?
UP Panchayat chunav: प्रधानों के प्रशासक नियुक्ति होने से तय हो गया है कि विधानसभा के बाद ही यूपी में पंचायत चुनाव कराए जाएंगे। ऐसे में भाजपा-सपा समेत सभी दलों को राहत मिल गई है। कोई दल नहीं चाहता था कि विधानसभा से पहले पंचायत में उतरकर ग्रामीण गुटबाजी का शिकार बने।

UP Panchayat chunav: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण और स्थानीय स्तर की राजनीति में एक बेहद दिलचस्प मोड़ आ चुका है। ग्राम प्रधानों को पंचायत चुनाव तक प्रशासक बनाने का आदेश जारी कर दिया गया है। मंगलवार को सभी प्रधानों का कार्यकाल पूरा होगा और वह प्रशासक बन जाएंगे। प्रदेश में ऐसा पहली बार हो रहा है। प्रधानों को प्रशासक बनाने से यह तय हो गया है कि विधानसभा के बाद ही पंचायत चुनाव कराए जाएंगे। ऐसे में सभी दल राहत महसूस कर रहे हैं।
भाजपा-सपा को कैसी राहत
अमूमन सभी दलों को पंचायतों में जोर-आजमाइश का इंतजार रहता है। पार्टियां इस चुनाव का बेसब्री से इंतजार करती हैं। इस बार ऐसा नहीं दिखाई दिया है। चुनाव टलने से भाजपा-सपा समेत हर दलों को राहत मिली है। सत्ताधारी भाजपा की तरफ से पंचायत चुनाव समय पर कराने की न तो कोई कोशिश हुई और न ही विपक्षी दलों खासकर सपा की तरफ से चुनाव के लिए उस तरह का दबाव बनाया गया। पंचायत चुनाव अभी नहीं होने से सभी दलों को फायदा दिखाई दे रहा है। अगले कुछ महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कोई भी दल पंचायत चुनाव में उतरने का जोखिम नहीं लेना चाहता है।
एक को टिकट, बाकी सब नाराज
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ग्राम प्रधान और पंचायत स्तर के चुनाव पूरी तरह से जमीनी और व्यक्तिगत प्रभाव वाले होते हैं। गांव-गांव में राजनीतिक दलों के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले कई मजबूत दावेदार होते हैं। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यदि पंचायत चुनाव कराए जाते तो दलों के सामने सबसे बड़ा संकट टिकट बंटवारे का होता।
हर गांव, ब्लॉक और तहसील पर कई टिकट के दावेदार होते। किसी एक को टिकट देने का मतलब था कि अन्य दावेदारों का विरोध झेलना होता। यह विरोध और नाराजगी पंचायत चुनाव में तो नुकसान नहीं कराती लेकिन विधानसभा चुनाव के नजरिए से काफी नुकसान कर सकती थी। विधानसभा चुनाव से ऐन पहले एक ही दल के कई दावेदार आपस में ही गुटबाजी करते और इसका सीधा नुकसान पार्टियों को विधानसभा चुनाव में होता। ऐसे में सभी दलों को इस बात की राहत मिल गई है कि अब गांव-गांव में चुनावी रंजिश और अपनों की नाराजगी झेलने का खतरा टल गया है।
आयोग की रिपोर्ट के बाद भी चुनाव पर क्यों संकट
पंचायती राज विभाग के नियमों के अनुसार प्रधानों का कार्यकाल पूरा होते ही गांवों का कामकाज ठप न हो, इसलिए वहां प्रशासकों की नियुक्त जरूरी है। अभी तक अधिकारियों को प्रशासक बनाया जाता रहा है। इस बार प्रधानों को ही प्रशासक बना दिया गया है। माना जा रहा है कि आरक्षण पर ओबीसी आयोग की रिपोर्ट छह महीने में आने के बाद भी पंचायत चुनाव तत्काल कराना संभव नहीं हो सकेगा।
जानकारों का कहना है कि आयोग द्वारा विभिन्न रिपोर्ट तैयार करने और उसके बाद की आधिकारिक कानूनी प्रक्रिया को पूरा करने में भी कुछ महीनों का समय लगेगा। तब तक विधानसभा चुनाव का समय आ जाएगा। ऐसे में पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं हो सकेगा।
दूसरा कारण जनगणना भी है। अगर आयोग अपनी रिपोर्ट समय से पहले देता है तब भी पंचायत चुनाव में पेच है। प्रशासनिक मशीनरी इस समय जनगणना के हाउस होल्ड सर्वे में लगी है। इसके बाद आम लोगों की जनगणना शुरू होगी। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया के लिए कर्मचारियों का मिलना मुश्किल होगा।
विधानसभा चुनाव पर सभी दलों का पूरा फोकस
ग्राम प्रधानों के ही प्रशासक बनने से अब सभी दलों का पूरा ध्यान ग्रामीण गुटबाजी से हटकर सीधे विधानसभा सीटों पर केंद्रित हो गया है। भाजपा जहां अपने संगठन को मजबूत करने और सरकार की योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश में जुट गई है। वहीं समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव के अपने शानदार प्रदर्शन को विधानसभा में दोहराने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा के सहयोगी सुभासपा के ओपी राजभर, निषाद पार्टी के संजय निषाद और अपना दल की अनुप्रिया पटेल भी लगातार फिल्ड में उतरे हुए हैं।
सपा की सहयोगी कांग्रेस के नेता भी जिले-जिले का दौरा कर रहे हैं और अलग-अलग कारणों से चर्चा में बने हुए हैं। बसपा प्रमुख मायावती भी मोर्चेबंदी में लगी हुई हैं। रविवार को ही उन्होंने पार्टी की बड़ी बैठक बुलाई और विधानसभा चुनाव की रणनीति पर चर्चा करने के साथ पार्टी नेताओं को कई निर्देश दिए हैं। बसपा पहली पार्टी भी है जिसने विधानसभा चुनाव के लिए अपने कई प्रत्याशियों का ऐलान भी कर दिया है।




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