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यूपी सरकार को शक, मिलावटी हल्दी से घट रहा बच्चों का आईक्यू; प्रदेश भर में शुरू हुई जांच

  • मिलावटी हल्दी बच्चों का आईक्यू लेवल घटा रही है। गर्भवतियों पर भी बुरा असर डालने के साथ तमाम बीमारियों को न्योता दे रही है। बांग्लादेश की केस हिस्ट्री सामने आने के बाद इन तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता। नीति आयोग से लेकर UP सरकार तक इसे लेकर चिंतित है।

Sat, 14 Sep 2024 05:56 AMAjay Singh लाइव हिन्दुस्तान
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यूपी सरकार को शक, मिलावटी हल्दी से घट रहा बच्चों का आईक्यू; प्रदेश भर में शुरू हुई जांच

आयुर्वेद में जिस हल्दी को बेहद गुणकारी और भारत का केसर कहा गया है, मिलावटखोरों ने उसे जहरीला बना दिया है। यह मिलावटी हल्दी बच्चों का आईक्यू लेवल घटा रही है। गर्भवतियों पर भी बुरा असर डालने के साथ तमाम बीमारियों को न्योता दे रही है। बांग्लादेश की केस हिस्ट्री सामने आने के बाद इन तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता। नीति आयोग से लेकर यूपी सरकार तक इसे लेकर चिंतित है। सरकार को अंदेशा है कि कहीं यूपी के बच्चों के मानसिक स्तर को भी यह लेड मिश्रित हल्दी प्रभावित तो नहीं कर रही। ऐसे में प्रदेश भर में हल्दी की जांच कराई जा रही है। यूपी के सभी जिलों से तकरीबन 3800 सेंपल लिए गए हैं।

खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के अफसरों की मानें तो अगस्त में मुख्य सचिव के समक्ष विश्व बैंक की टीम की मौजूदगी में बांग्लादेश की केस हिस्ट्री को लेकर एक प्रजेंटेशन दिया गया था। इसमें बताया गया कि बांग्लादेश कैसे एक हल्दी क्रांति का वाहक बना। लेड मिश्रित हल्दी के घातक प्रभावों ने कैसे बांग्लादेशी बच्चों का आईक्यू लेबल करीब सात प्वाइंट तक घटा दिया था। बांग्लादेशी पुरुषों-महिलाओं के रक्त में लेड की मौजूदगी भी घातक स्तर तक थी। इस प्रजेंटेशन के बाद खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग ने हल्दी की सेंपलिंग का अभियान पूरे प्रदेश में शुरू किया। यूपी में प्रदेश भर से लिए गए हल्दी के करीब 3800 नमूनों को जांच के लिए लैब भेजा गया है। इनकी रिपोर्ट आने के बाद स्पष्ट होगा कि हल्दी में लेड की मिलावट की स्थिति क्या है।

बांग्लादेश ने दो साल में की हल्दी क्रांति

बांग्लादेश ने 2019 में अपने यहां हल्दी को लेकर बड़े पैमाने पर अभियान शुरू किया। जांच में पता चला कि बांग्लादेशी बाजारों में उपलब्ध हल्दी में 47 फीसदी लेड मिश्रित है। कड़ी कार्रवाई के प्रावधानों और जागरूकता के चलते सिर्फ दो साल में उन्होंने इस बड़ी समस्या पर काबू पा लिया। इस मुहिम को स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी और इंटरनेशनल सेंटर फॉर डायरियल डिजीज रिसर्च बांग्लादेश ने फूड सेफ्टी अथॉरिटी बांग्लादेश के साथ मिलकर अंजाम दिया। बांग्लादेश को यह प्रेरणा 2017 के आसपास न्यूयार्क सिटी के स्वास्थ्य विभाग के शोध से मिली। वहां को शोधकर्ताओं द्वारा बांग्लादेश, भारत, नेपाल, पाकिस्तान व मोरक्को से लिए गए हल्दी के 100 सेंपलों में से 72 फीसदी में लेड की अधिकता मिली थी।

क्या हैं डब्ल्यूएचओ के मानक

लेड मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसका कोई सुरक्षित लेवल तय नहीं है। फिर भी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मानव शरीर में अधिकतम 5 माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर लेड की उपस्थिति को खतरे की घंटी बताया है जबकि बांग्लादेश के लोगों के खून में लेड की मात्रा 6.8 माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर मिली थी। एक अंतर्राष्ट्रीय शोध के मुताबिक गरीब देशों के बच्चों की तुलना में अमीर देशों के बच्चों के सीखने की क्षमता में करीब 20 फीसदी का अंतर लेड के कारण होता है।

उम्रकैद तक की सजा का है प्रावधान

मानव स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने वाली चीजों की खाद्य पदार्थों में मिलावट पर कड़ी सजा और जुर्माने का प्रावधान है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इसमें तीन माह से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है जबकि 10 लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है।

यूपी में पहली बार लेड की दृष्टि से जांच

यूं तो खाद्य पदार्थों, मसालों आदि के नमूने नियमित रूप से खाद्य निरीक्षकों द्वारा लिए जाते हैं। हल्दी के सेंपल भी जो अब तक लिए जाते थे, वे सिर्फ रंग आदि की मिलावट की जांच तक सीमित थे। पहले लखनऊ को छोड़ प्रदेश की किसी लैब में हैवी मेटल या पेस्टीसाइड्स की जांच की व्यवस्था नहीं थी। अब यह प्रदेश की कई लैब में उपलब्ध है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

केजीएमयू न्‍यूरोलॉजी विभाग के अध्‍यक्ष डाॅ.आरके गर्ग का कहना है कि लेड का शरीर में जमा होना सेहत के लिए घातक है। इससे सबसे ज्यादा दिमाग प्रभावित होता है। व्यक्ति बार-बार बेहोश हो सकता है। दौरे या झटके आ सकते हैं। लंबे समय तक लेड के संपर्क में आने से याददाश्त भी कमजोर हो सकती है। हाथ व पैर में लकवा मार सकता है। अचानक ज्यादा लेड शरीर में पहुंचने से मरीज की जान जोखिम में पड़ सकती है।

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