Temple Public Institution High Court Sets Aside Trial Court Order Granting Permission to File Suit मंदिर सार्वजनिक संस्था, वाद दायर करने की अनुमति, हाई कोर्ट ने रद्द किया ट्रायल कोर्ट का आदेश, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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मंदिर सार्वजनिक संस्था, वाद दायर करने की अनुमति, हाई कोर्ट ने रद्द किया ट्रायल कोर्ट का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इटावा के एक प्राचीन राम-जानकी मंदिर विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मंदिर को प्रथमदृष्टया सार्वजनिक धार्मिक संस्था माना है। कोर्ट ने धारा 92 सीपीसी के तहत मुकदमा दायर करने की अनुमति दे दी है।

Thu, 14 May 2026 08:48 PMDinesh Rathour प्रयागराज, विधि संवाददाता
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मंदिर सार्वजनिक संस्था, वाद दायर करने की अनुमति, हाई कोर्ट ने रद्द किया ट्रायल कोर्ट का आदेश

Allahabad Highcourt Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इटावा के एक प्राचीन राम-जानकी मंदिर विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मंदिर को प्रथमदृष्टया सार्वजनिक धार्मिक संस्था माना है। कोर्ट ने धारा 92 सीपीसी के तहत मुकदमा दायर करने की अनुमति दे दी है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 13 जनवरी 2026 को पारित आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि इस स्तर पर केवल यह देखना होता है कि मामला सुनवाई योग्य है या नहीं, पक्षकारों के अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं किया जाता।

रामचंद्र जी महाराज विराजमान मंदिर, रामताल ने याचिका दाखिल कर ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। याचिका पर न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मंदिर सार्वजनिक स्वरूप का है, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए आते हैं और मंदिर के प्रबंधन के लिए विधिवत प्रबंध समिति की आवश्यकता है। दूसरी ओर प्रतिवादियों ने दावा किया कि मंदिर तथा उससे जुड़ी संपत्तियां महेश्वरी परिवार की निजी संपत्ति हैं और परिवार ही वर्षों से ‘सरवराहकार’ के रूप में उसका प्रबंधन करता आ रहा है।

अदालत के समक्ष यह भी तथ्य रखा गया कि स्वर्गीय रामस्वरूप महेश्वरी के बाद परिवार के सदस्यों द्वारा मंदिर की देखरेख की जाती रही। वर्ष 1972 में कस्तूरी देवी ने अपनी संपत्तियों के संबंध में वसीयत की थी, जिसके बाद शांति देवी और फिर उनके दत्तक पुत्र अरविंद कुमार को अधिकार प्राप्त हुए। वसीयत में यह भी उल्लेख था कि संपत्ति की बिक्री से प्राप्त धन मंदिर के जीर्णोद्धार और मरम्मत में लगाया जाएगा। वर्ष 2012 में मंदिर परिसर में दुकानों का निर्माण भी कराया गया था।

प्रतिवादियों ने यह भी कहा कि मंदिर के पुजारियों की नियुक्ति परिवार द्वारा की जाती रही है। पहले एक बाबा, फिर नेपाली बाबा, उसके बाद इरेंद्र दास और बाद में जीतू गौर पूजा-पाठ करते रहे। वर्ष 2020 में श्यामसुंदर दास को मंदिर की चाबियां सौंपी गईं, लेकिन बाद में उन पर असामाजिक तत्वों से संबंध रखने और मंदिर परिसर को आपराधिक गतिविधियों का केंद्र बनाने के आरोप लगाए गए। प्रतिवादियों के अनुसार जब मंदिर की चाबियां वापस मांगी गईं तो उन्होंने लौटाने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि मंदिर का सार्वजनिक स्वरूप दोनों पक्षों द्वारा विवादित नहीं है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि प्रतिवादियों द्वारा मंदिर के निजी प्रबंधन अथवा पूर्वजों की सरवराहकारशिप से संबंधित कोई ठोस दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने माना कि मंदिर लंबे समय से आम जनता के उपयोग और पूजा-अर्चना के लिए खुला रहा है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित “कंस्ट्रक्टिव ट्रस्ट” के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक धार्मिक उपयोग से भी ट्रस्ट का स्वरूप उत्पन्न हो सकता है, भले ही औपचारिक ट्रस्ट डीड न हो। अदालत ने विश्वनाथ बनाम ठाकुर राधा बल्लभ जी मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने धारा 92 सीपीसी लागू होने की आवश्यक शर्तों को स्पष्ट किया था।

फैसले में कहा गया कि धारा 92 सीपीसी के अंतर्गत मुकदमा दायर करने की अनुमति देते समय अदालत केवल प्रथमदृष्टया तथ्यों को देखती है और इससे किसी पक्ष के अंतिम अधिकार प्रभावित नहीं होते। अंतिम निर्णय साक्ष्यों और सुनवाई के बाद ही किया जाएगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश/फास्ट ट्रैक कोर्ट, इटावा द्वारा पारित आदेश को निरस्त करते हुए धारा 92 सीपीसी के तहत मूल वाद दायर करने की अनुमति प्रदान कर दी। अपील को स्वीकार कर लिया।

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