तैयार चार्जशीट अनावश्यक लंबित न रखें पुलिस अधिकारी, हाईकोर्ट का यूपी डीजीपी को निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि विवेचना अधिकारी द्वारा तैयार की गई चार्जशीट को पुलिस अधिकारी अनावश्यक रूप से लंबित न रखें।

Allahabad Highcourt Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि विवेचना अधिकारी द्वारा तैयार की गई चार्जशीट को पुलिस अधिकारी अनावश्यक रूप से लंबित न रखें और उस पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करें। यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार तथा न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने गुलाब चंद्र सैनी व अन्य की याचिका पर याची के अधिवक्ता विभू राय को सुनकर दिया है।
मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विभु राय ने अदालत को बताया कि पूर्व में 3 अप्रैल 2026 को याचिका इस आधार पर खारिज कर दी गई थी कि पुलिस की ओर से अदालत को सूचित किया गया था कि मामले में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है। हालांकि बाद में जानकारी मिली कि चार्जशीट अदालत में दाखिल नहीं की गई थी, बल्कि केवल विवेचना अधिकारी द्वारा तैयार कर सर्किल ऑफिसर के कार्यालय में लंबित रखी गई थी। विभागीय पोर्टल पर इसे “फाइल्ड” दिखाया जा रहा था।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि केवल चार्जशीट तैयार कर लेना पर्याप्त नहीं है। जब तक सक्षम न्यायालय में उसे प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक विधिक प्रक्रिया पूर्ण नहीं मानी जा सकती। साथ ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का दायित्व है कि वे चार्जशीट की समीक्षा कर या तो पुनः विवेचना के निर्देश दें अथवा उसे तत्काल अदालत में प्रस्तुत कराएं। खंडपीठ ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए 3 अप्रैल 2026 का अपना पूर्व आदेश वापस लेते हुए याचिका को पुनः बहाल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मामले में जब तक चार्जशीट सक्षम अदालत में दाखिल नहीं हो जाती, तब तक याचिकाकर्ताओं को पूर्व में दी गई अंतरिम सुरक्षा जारी रहेगी। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद सक्षम अदालत कानून के अनुसार संज्ञान लेने के लिए स्वतंत्र होगी।
हाईकोर्ट ने डीजीपी, उत्तर प्रदेश को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर सभी सर्किल अधिकारियों और संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को एक परिपत्र जारी करें। इसमें निर्देश हो कि विवेचना अधिकारी द्वारा चार्जशीट सौंपे जाने के बाद उस पर तुरंत निर्णय लिया जाए-या तो पुनः जांच के लिए लौटाया जाए या तत्काल संबंधित अदालत में प्रस्तुत किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि जारी होने वाला परिपत्र हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी उपलब्ध कराया जाए। साथ ही अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता और रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को आदेश की प्रति तीन दिनों के भीतर डीजीपी को भेजने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही अदालत ने याचिका का निस्तारण कर दिया।




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