राजू पाल हत्याकांड के दोषी आबिद को बड़ी राहत, हाई कोर्ट ने निलंबित की सजा, जमानत पर रिहा
राजू पाल हत्याकांड में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोषसिद्ध अभियुक्त आबिद को बड़ी राहत देते हुए उसकी सजा निलंबित कर जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।

Allahabad Highcourt: बहुचर्चित राजू पाल हत्याकांड में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोषसिद्ध अभियुक्त आबिद को बड़ी राहत देते हुए उसकी सजा निलंबित कर जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा कि वर्ष 2024 से लंबित आपराधिक अपील के निकट भविष्य में सुने जाने की संभावना कम है, इसलिए अपील के अंतिम निर्णय तक अभियुक्त को जमानत दी जा सकती है।
आबिद की ओर से कहा गया कि उसका नाम मूल एफआईआर में नहीं था और उसके खिलाफ केवल सह-अभियुक्तों के बयानों के आधार पर कार्रवाई की गई। बचाव पक्ष का तर्क था कि किसी भी गवाह ने प्रारंभिक जांच के दौरान उसकी पहचान नहीं की थी, बाद में सीबीआई जांच के दौरान गवाहों के बयान बदल गए। यह भी कहा गया कि कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराई गई तथा उसके कब्जे से कोई आपत्तिजनक वस्तु बरामद नहीं हुई। सीबीआई ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि घायल गवाहों सहित अभियोजन पक्ष के गवाहों ने अदालत में अभियुक्त की पहचान की है और ट्रायल कोर्ट ने विस्तृत विश्लेषण के बाद दोषसिद्धि की है। सीबीआई ने यह भी कहा कि आबिद का लंबा आपराधिक इतिहास है।
खंडपीठ ने कहा कि एफआईआर में केवल अतीक अहमद और अशरफ के नाम दर्ज थे, जबकि बाद में दोषी ठहराए गए अन्य आठ आरोपियों के नाम एफआईआर में नहीं थे। अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने कहा कि वे आरोपियों को पहले से जानते थे, फिर भी जांच के दौरान उनके नाम क्यों नहीं बताए गए, इसका संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिला। अदालत ने कहा कि केवल लंबित आपराधिक मुकदमों के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता। आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय प्रभाकर तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2020) का उल्लेख किया गया। साथ ही हाल के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय तुकेश सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2025) का हवाला देते हुए कहा कि केवल अदालत में पहचान (डाक आइडेंटीफिकेशन) अपने आप में दोषसिद्धि का मजबूत आधार नहीं मानी जाती और इसे कानून में अपेक्षाकृत कमजोर साक्ष्य माना गया है।
जमानत के साथ लगाई गई शर्तें
हाईकोर्ट ने आबिद की सजा को अपील लंबित रहने तक निलंबित करते हुए उसे निजी मुचलका और दो जमानतदार प्रस्तुत करने पर रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि वह न्यायालय की अनुमति के बिना अपनी अचल संपत्ति का हस्तांतरण नहीं करेगा। साथ ही रिहाई के एक महीने के भीतर लगाए गए जुर्माने की 50 प्रतिशत राशि जमा करनी होगी, जबकि शेष 50 प्रतिशत राशि की वसूली अपील के अंतिम निर्णय तक स्थगित रहेगी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि पूर्व सांसद अतीक अहमद और पूर्व विधायक अशरफ की ट्रायल के दौरान मृत्यु हो चुकी है इसलिए यह मामला एमपी/एमएलए श्रेणी में नहीं माना जाएगा।
बसपा विधायक समेत तीन ही हुई थी हत्या
25 जनवरी 2005 को धूमनगंज में बसपा विधायक राजू पाल समेत तीन की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, तीन घायल हुए थे। प्रारंभिक एफआईआर राजू पाल की पत्नी पूजा पाल ने दर्ज कराई थी। जांच के दौरान आबिद का नाम सह-अभियुक्तों के कथित इकबालिया बयानों के आधार पर सामने आया और उसके विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया गया। मामले की शुरुआती जांच स्थानीय पुलिस ने की। 12 दिसंबर 2008 को जांच सीबीसीआईडी को सौंप गई, जिसने पूरक आरोपपत्र दाखिल कर पांच और आरोपियों को शामिल किया। इसके बाद शिकायतकर्ता पूजा पाल की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपते हुए नए सिरे से (डी-नोवो) जांच का आदेश दिया। सीबीआई ने अपनी जांच में सात व्यक्तियों को साक्ष्य के अभाव में क्लीनचिट देते हुए दस आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। मुकदमे के बाद ट्रायल कोर्ट (विशेष न्यायालय सीबीआई लखनऊ) ने आबिद सहित अन्य अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।




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