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लखनऊ में भूमाफियाओं ने 2 अरब की सरकारी जमीन बेच डाली, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे अधिकारी

यूपी की राजधानी लखनऊ में भूमाफियाओं ने 2 अरब रुपए की सरकारी जमीन बेच डाली। प्रशासन व लखनऊ विकास प्राधिकरण के अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। जमीनी हकीकत यह है कि वहां प्लॉट कट चुके हैं, मकान बन चुके हैं और अवैध निर्माण लगातार जारी है।

Fri, 9 Jan 2026 04:20 PMDeep Pandey लखनऊ। विजय वर्मा
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लखनऊ में भूमाफियाओं ने 2 अरब की सरकारी जमीन बेच डाली, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे अधिकारी

राजधानी लखनऊ में भूमाफियाओं ने अर्बन सीलिंग की करीब 270 बीघे सरकारी जमीन बेच डाली और प्रशासन व लखनऊ विकास प्राधिकरण हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। कीमत के लिहाज से यह जमीन दो अरब रुपये से भी अधिक आंकी जा रही है। कागजों में जमीन आज भी अर्बन सीलिंग की है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वहां प्लॉट कट चुके हैं, मकान बन चुके हैं और अवैध निर्माण लगातार जारी है।

औरंगाबाद जागीर की 2,43,185.55 वर्ग मीटर और औरंगाबाद खालसा की 4,33,760.89 वर्ग मीटर, यानी कुल 6,76,946.44 वर्ग मीटर जमीन अर्बन सीलिंग के अंतर्गत आती है। क्षेत्रफल के हिसाब से यह लगभग 270 बीघे होती है। जानकारों के मुताबिक, अगर इस जमीन को बेहद कम दर पर भी बेचा जाए, तब भी इसकी कीमत दो अरब रुपये से कम नहीं बैठती। इसके बावजूद यह पूरी जमीन भूमाफियाओं के हवाले हो चुकी है।

अर्बन सीलिंग की जमीन को निजी संपत्ति की तरह बेचा गया

अर्बन सीलिंग की जमीन, जिसे कानूनन न बेचा जा सकता है और न ही निजी उपयोग में लिया जा सकता है, उसे प्रॉपर्टी डीलरों ने खुलेआम निजी संपत्ति की तरह बेचा। बिना किसी वैध लेआउट, बिना टाउनशिप योजना पास कराए, प्लाटिंग कर दी गई और आम लोगों को प्लॉट थमा दिए गए।

प्रवर्तन दस्ता सोता रहा, अवैध कॉलोनियां बसती रहीं

भूमाफियाओं की इस पूरी गतिविधि के दौरान एलडीए का प्रवर्तन दस्ता पूरी तरह निष्क्रिय नजर आया। अवैध कॉलोनियां विकसित होती रहीं, सड़कें बनती रहीं, बिजली-पानी के स्थायी इंतजाम होते रहे, लेकिन किसी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जो निर्माण शुरुआती दौर में रोका जा सकता था, उसे समय रहते नहीं रोका गया।

सरकारी जमीन पर कब्जा, फिर भी कार्रवाई शून्य

मामला सिर्फ अर्बन सीलिंग की जमीन तक सीमित नहीं रहा। आरोप हैं कि इसी क्षेत्र में कई जगह सरकारी जमीन पर भी कब्जा किया गया। इसके बावजूद न जिला प्रशासन ने जमीन खाली कराई और न ही एलडीए ने उसे अपने कब्जे में लेने की कोशिश की। न सरकार को जमीन मिली, न ही उसका कोई मुआवजा या बाजार मूल्य।

भूमाफिया बने अरबपति, कुछ पहुंचे सत्ता के करीब

इस पूरे खेल का सबसे बड़ा फायदा भूमाफियाओं और प्रॉपर्टी डीलरों को हुआ। जमीन बेचकर कई लोग अरबपति बन गए। चर्चा है कि कुछ लोगों ने इसी अवैध कमाई के दम पर राजनीति में प्रवेश किया और सत्ता के गलियारों तक पहुंच बना ली। वहीं, सरकारी तंत्र की निष्क्रियता ने उनके हौसले और बढ़ा दिए।

कागजों में सरकारी, मौके पर माफियाओं का राज

दस्तावेजों में यह जमीन आज भी अर्बन सीलिंग के नाम दर्ज है, लेकिन मौके पर हालात इसके ठीक उलट हैं। बड़े पैमाने पर मकान बन चुके हैं, कुछ जगह बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो गई हैं और नई प्लाटिंग अब भी जारी है। यह साफ संकेत है कि भूमाफियाओं को किसी कार्रवाई का डर नहीं है।

2008 में एलडीए बना कस्टोडियन, फिर भी विफलता

वर्ष 2008 में शासन ने अर्बन सीलिंग की जमीनों की निगरानी के लिए एलडीए को कस्टोडियन बनाया था। जमीन का मूल मालिक जिला प्रशासन है, लेकिन न जिला प्रशासन जमीन बचा पाया और न ही कस्टोडियन के रूप में एलडीए अपनी जिम्मेदारी निभा सका। सबसे ज्यादा सवाल प्रवर्तन से जुड़े अधिकारियों की भूमिका पर खड़े हो रहे हैं।

अब कार्रवाई होगी या फिर मामला दबेगा?

आज स्थिति यह है कि जहां सरकारी जमीन होनी चाहिए थी, वहां निजी मकान खड़े हैं और लोग रह रहे हैं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन अब साहस दिखाकर कार्रवाई करेगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

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एलडीए संयुक्त सचिव सुशील प्रताप सिंह ने बताया कि मैं विहित प्राधिकारी का काम देखता हूं। मेरे पास जो भी ध्वस्तीकरण सीलिंग की फाइलें आई हैं उन सभी को हमने निस्तारित किया। गिराने का आदेश किया है। सील कराया है। प्रवर्तन विभाग को ही इस मामले में ठोस कार्यवाही करनी थी।

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