Iran special connection with Agra Markaz at the shrine of Noor Ullah Shustari ईरान का आगरा से खास कनेक्शन,नूर उल्लाह शुस्तरी की मजार पर उमड़ता है शियाओं का मरकज, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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ईरान का आगरा से खास कनेक्शन,नूर उल्लाह शुस्तरी की मजार पर उमड़ता है शियाओं का मरकज

ईरान का आगरा से गहरा नाता रहा है। इसी वजह से ईरान से शिया समुदाय के लोग आगरा शहीद-ए-सालिस काजी नूर उल्लाह शुस्तरी की मजार पर हाजिरी लगाते हैं। यह दुनिया में शिया समुदाय के सबसे बड़े मरकजों में से एक है।

Mon, 2 March 2026 11:50 AMPawan Kumar Sharma आगरा
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ईरान का आगरा से खास कनेक्शन,नूर उल्लाह शुस्तरी की मजार पर उमड़ता है शियाओं का मरकज

ईरान-इजराइल-अमेरिका जंग ने पूरी दुनिया को हिला दिया है। अमेरिका और इजराइल लगातार ईरान पर हमले कर रहे हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो चुकी है। इसके बाद ईरान ने हमले और तेज कर दिए हैं। ईरान का आगरा से गहरा नाता रहा है। इसी वजह से ईरान से शिया समुदाय के लोग आगरा आकर न्यू आगरा स्थित शहीद-ए-सालिस काजी नूर उल्लाह शुस्तरी की मजार पर हाजिरी लगाते हैं। यह दुनिया में शिया समुदाय के सबसे बड़े मरकजों में से एक है। नूर उल्लाह शुस्तरी अकबर के दौर में ईरान से आए और चीफ जस्टिस बने। जहांगीर के दौर में उन्हें शहीद कर दिया गया।

न्यू आगरा पुलिस थाने के सामने एक ऐतिहासिक इमारत है, जिसका लाल रंग का मुगलकालीन गेट है। गेट के अंदर बड़ी दरगाह है। इसी दरगाह में शहीद-ए-सालिस काजी नूर उल्लाह शुस्तरी की मजार है, जो शिया समुदाय के लिए अहमियत रखती है। इस मजार-ए-मुबारक पर हाजिरी लगाने को देश और दुनिया से अकीदतमंद आते हैं। नूर उल्लाह की पैदाइश ईरान के शुस्तर शहर में हुई थी। 35 साल की उम्र में वे हिंदुस्तान आए। 26 साल तक अकबर के दरबार में चीफ जस्टिस के रूप में सेवा दी। 63 साल की उम्र में उन्हें शहीद कर दिया गया।

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जहांगीर ने करवाया शहीद

किताब शहीद-ए-सालिस रहमतुल्लाह के अनुसार काजी नूर उल्लाह शुस्तरी (1549-1610) मुगल बादशाह अकबर के दौर में लाहौर और आगरा के काजी-उल-कुज्जात थे। जहांगीर के शासनकाल में उन्हें आगरा में शहीद कर दिया गया। उन्हें न्यू आगरा स्थित स्थान पर दफनाया गया, जिसे आज मजार शहीद-ए-सालिस काजी नूर उल्लाह शुस्तरी के नाम से जाना जाता है। 1188 हिजरी में सैयद मंसूर निशापूरी ने मजार का निर्माण कराया। यह स्थान आज बड़ा मरकज है, जहां शिया और सुन्नी दोनों समुदायों के लोग आते हैं। साल भर यहां धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। हर साल उनकी शहादत पर विशेष आयोजन होता है।

काजी नूर उल्लाह ने 140 से ज्यादा किताबें लिखीं

दरगाह परिसर में मजार के अलावा एक मस्जिद भी है, जहां नमाज अदा की जाती है। देश-विदेश के जायरीन यहां आते हैं। परिसर में ठहरने की व्यवस्था भी है। काजी नूर उल्लाह शुस्तरी ने 140 से अधिक किताबें लिखीं, जो देश और दुनिया में पढ़ी जाती हैं।

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कानपुर में खामेनेई की मौत पर तीन दिन का शोक

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई की अमेरिकी-इजरायली हमले में मौत के बाद शहर के मुस्लिम समाज में विशेषकर शिया समुदाय में गम ओ गुस्से की लहर दौड़ गई। कानपुर में शिया हजरात ने मजलिसें कर ईरानी नेता को शहीद करार देते हुए तीन दिन के शोक का ऐलान किया। वहीं, सुन्नी उलमा ने घटना पर अमेरिका-इजरायल के खिलाफ गहरी नाराजगी जताई।

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