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ईरान-इजराइल युद्ध की आंच से यूपी में मोम का संकट; ठप हो सकते हैं कई लघु-मध्यम उद्योग

लखनऊ में रोजाना औसतन 40 से 50 टन मोम की खपत होती है। इस मांग का एक बड़ा हिस्सा ईरान से आने वाले आयात पर निर्भर है, जो युद्ध के कारण पूरी तरह रुक गया है। कई दवाओं की कोटिंग और बेस तैयार करने में मोम का उपयोग होता है। प्लाईबोर्ड और तिरपाल उद्योगों में वाटरप्रूफिंग के लिए मोम अनिवार्य है।

Mon, 2 March 2026 10:35 PMAjay Singh वरिष्ठ संवाददाता, लखनऊ
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ईरान-इजराइल युद्ध की आंच से यूपी में मोम का संकट; ठप हो सकते हैं कई लघु-मध्यम उद्योग

UP News: मध्य पूर्व में गहराते ईरान-इजराइल सैन्य संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ राजधानी लखनऊ सहित यूपी के कुछ शहरों के स्थानीय उद्योगों की कमर तोड़ना शुरू कर दिया है। इस युद्ध का सबसे बड़ा और सीधा प्रहार कच्चे माल, विशेषकर मोम की आपूर्ति पर पड़ा है। लखनऊ के उद्यमियों ने कहा कि यदि तनाव जल्द समाप्त नहीं हुआ, तो शहर के कई लघु और मध्यम उद्योग पूरी तरह ठप हो सकते हैं। कई दवाओं की कोटिंग और बेस तैयार करने में मोम का उपयोग होता है। प्लाईबोर्ड और तिरपाल उद्योगों में वाटरप्रूफिंग के लिए मोम अनिवार्य है।

ऐशबाग के प्रमुख मोम कारोबारी मोहित गोयल ने बताया कि लखनऊ में रोजाना औसतन 40 से 50 टन मोम की खपत होती है। इस मांग का एक बड़ा हिस्सा ईरान से आने वाले आयात पर निर्भर है, जो युद्ध के कारण पूरी तरह रुक गया है। उन्होंने बताया कि कई दवाओं की कोटिंग और बेस तैयार करने में मोम का उपयोग होता है। प्लाईबोर्ड और तिरपाल उद्योगों में वाटरप्रूफिंग के लिए मोम अनिवार्य है। कच्चे माल की कमी से मोमबत्ती उद्योग की लागत में भारी इजाफा हुआ है।

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पेट्रोलियम उत्पादों और विनिर्माण पर दोहरी मार

सीआईआई यूपी चैप्टर की चेयरपर्सन डॉ. उपासना अरोड़ा के अनुसार, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें न केवल विनिर्माण बल्कि लॉजिस्टिक्स और परिवहन को भी महंगा कर रही है। इससे एमएसएमई क्षेत्रों के मुनाफे में भारी गिरावट की आशंका है, क्योंकि उत्पादन लागत और बाजार की मांग के बीच संतुलन बिगड़ रहा है।

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निवेशकों में बढ़ती अनिश्चितता और बाजार का दबाव

आईआईए के सदस्य मोहम्मद सउद ने चिंता जताई कि यह संकट ऐसे समय में आया है जब उद्योग कोरोना के प्रभाव से उबरकर विकास की ओर बढ़ रहे थे। युद्ध की स्थिति ने न केवल निवेशकों के भरोसे को डिगाया है, बल्कि भारतीय मुद्रा में उतार-चढ़ाव की वजह से आयातित कच्चे माल पर निर्भर कारोबारियों के लिए वित्तीय योजना बनाना चुनौतीपूर्ण कर दिया है।

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