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IIT, IIM, स्कूलों में खुश रहना क्यों नहीं सिखाया जाता, IAS दिव्या मित्तल का क्यों छलका दर्द?

आईआईटी दिल्ली, आईआईएम बैंगलोर और यूपीएससी जैसी देश की सबसे कठिन परीक्षाएं पास करने वाली आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की कमियों पर सोशल मीडिया पर एक बेहद भावुक पोस्ट साझा की है।

Tue, 19 May 2026 02:02 PMYogesh Yadav लाइव हिन्दुस्तान
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IIT, IIM, स्कूलों में खुश रहना क्यों नहीं सिखाया जाता, IAS दिव्या मित्तल का क्यों छलका दर्द?

देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में शुमार आईआईटी, आईआईएम और यूपीएससी (IAS) को क्रैक करने वाली वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल का शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बड़ा दर्द छलका है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक बेहद भावुक और आंखें खोलने वाली पोस्ट लिखी है, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया है कि आखिर हमारे स्कूलों और देश के शीर्ष संस्थानों में बच्चों को खुश रहना और मानसिक शांति क्यों नहीं सिखाई जाती?

आईएएस दिव्या मित्तल ने अपनी पोस्ट में लिखा, "आईआईटी दिल्ली से आईआईएम बैंगलोर और फिर आईएएस। मुझे इस देश की सबसे बेहतरीन शिक्षा मिलने का सौभाग्य मिला। इस शिक्षा ने मुझे कठिन परीक्षाओं को पास करना और बड़ी जिम्मेदारियों को संभालना तो सिखा दिया, लेकिन मुझे अपने मन को शांत रखना या अकेलेपन से निपटना कभी नहीं सिखाया। हम जीवन में सफलता हासिल करने के लिए सालों साल पढ़ाई करते हैं, लेकिन खुश रहने के लिए एक दिन भी नहीं सीखते।" उन्होंने स्कूल और उच्च शिक्षा में छूटी हुई उन 9 महत्वपूर्ण बातों को बताया है, जो हर इंसान को एक सफल और खुशहाल बनने के लिए बेहद जरूरी हैं।

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दिल की कमेस्ट्री नहीं सिखाई

कहा कि हमने स्कूलों में पीरियोडिक टेबल (आवर्त सारणी) तो रट ली, लेकिन किसी ने हमें टूटे हुए दिल की केमिस्ट्री नहीं समझाई। स्कूलों में हमेशा 'शांत रहने' का दबाव बनाया गया और शिक्षकों ने इस खामोशी को 'मानसिक शांति' समझ लिया। यही वजह है कि आज बड़े होने के बाद हम अपने भीतर उठने वाले भावनाओं के तूफान को संभाल नहीं पाते और उसमें डूब जाते हैं। हमें भावनाओं को दबाना सिखाया गया, उन्हें समझना और प्रोसेस करना नहीं।

बॉस से ना कहना नहीं सिखाया गया

कहा कि हमें परीक्षाओं में परफेक्ट निबंध लिखना तो सिखाया गया, लेकिन व्यावहारिक जीवन में "मुझे तकलीफ हो रही है" या किसी बात के लिए गरिमा के साथ "ना (No)" कहना नहीं सिखाया गया। हमें वयस्कों की दुनिया की भाषा नहीं सिखाई जाती। किसी बॉस द्वारा किए जाने वाले मानसिक उत्पीड़न के खिलाफ खड़े होने या अपनी पर्सनल लाइफ की सीमाओं की रक्षा करने के लिए 'ना' कहने का कोई कोर्स हमारे यहां नहीं है।

अंधी भेड़चाल का हिस्सा बन जाते हैं

स्कूल में वही बच्चा जीतता था जिसके पास सबसे ज्यादा 'जवाब' होते थे, लेकिन असल जिंदगी में वही इंसान टिक पाता है जो सबसे ज्यादा 'सवाल' पूछता है। यही कारण है कि आज बहुत से लोग किसी भी राय को पूरे आत्मविश्वास के साथ दोहरा तो देते हैं, लेकिन वे कभी यह सवाल नहीं करते कि वह राय आई कहां से है। हमें स्कूल में हर बात को अंतिम सत्य की तरह बताया गया, इसलिए हम बिना सोचे-समझे बस अंधी भेड़चाल का हिस्सा बन जाते हैं।

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पैसा सिर्फ गणित नहीं है

हमने गणित सीखने और समीकरणों में 'x' का मान निकालने में सालों बिता दिए, लेकिन खुद को कर्ज के जाल से बचाना कभी नहीं सीखा। पैसा सिर्फ गणित नहीं है, यह अपनी मर्जी से जीने की आजादी है। हमें नहीं सिखाया जाता कि कर्ज का सही इस्तेमाल कैसे करें ताकि वह हमारी आजादी को न छीने। बिना सोचे-समझे खर्च करने की आदत कैसे मानसिक तनाव और रिश्तों को प्रभावित करती है, यह शिक्षा से गायब है। शिक्षा का पूरा ध्यान सिर्फ पैसा कमाने पर होता है, कमाने के बाद उसे समझदारी से मैनेज करने पर नहीं।

अनुशासन का क्या मतलब

स्कूल का माहौल हमेशा घंटियों और निश्चित टाइम-टेबल से बंधा होता था, जहां कोई दूसरा हमेशा हमें बताता था कि कब और क्या करना है। लेकिन जब हम वयस्क होते हैं, तो यह दुनिया पूरी तरह खामोश हो जाती है, वहां कोई बताने वाला नहीं होता। अनुशासन का सीधा सा मतलब है—'खुद से किए गए वादों को निभाना।' हममें से कई लोगों में आज इसी आदत की कमी है क्योंकि हम बिना किसी शिक्षक की निगरानी के खुद को आगे बढ़ाना जानते ही नहीं।

खुद का अच्छा दोस्त बनना नहीं सिखाया जाता

स्कूलों में हम हमेशा दोस्तों और लोगों से घिरे रहते हैं। लेकिन बड़े होने के बाद जो सन्नाटा मिलता है, उसकी गूंज कितनी भारी हो सकती है, इसका अहसास हमें बाद में होता है। हम अकेला इसलिए महसूस करते हैं क्योंकि हमें खुद का सबसे अच्छा दोस्त बनना सिखाया ही नहीं गया। मानसिक शांति का मतलब यह सीखना है कि अकेले होने का मतलब एकाकीपन या अवांछित होना नहीं है, बल्कि यह खुद को तलाशने का एक पवित्र स्थान है।

लोगों के चेहरे पर लगे मुखौटे देखना नहीं आता

स्कूल का समय मासूमियत का होता है जहां दोस्त आसानी से बन जाते हैं। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हर इंसान में वह शुद्धता नहीं रहती। हम अक्सर खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं क्योंकि हमें लोगों के छिपे हुए इरादों या उनके चेहरों पर लगे मुखौटों को देखना नहीं सिखाया गया। लोगों को पढ़ने का मतलब है—उनके शब्दों के पीछे छिपे सच को देखने की शांत समझ होना।

आत्मा और मानसिक स्वास्थ्य के लिए कुछ नहीं

हमारे स्कूलों में शरीर को स्वस्थ रखने के लिए पीटी या जिम की क्लास तो होती थी, लेकिन हमारी आत्मा और मानसिक स्वास्थ्य के लिए कुछ नहीं था। हमें किसी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए थकावट के बावजूद खुद को झोंकना सिखाया जाता है, और यही वजह है कि लोग 'बर्नआउट' (पूरी तरह मानसिक रूप से थक जाना) का शिकार हो जाते हैं। अपने नर्वस सिस्टम का सम्मान करना ही एकमात्र तरीका है जिससे आपके अंदर की रोशनी कभी बुझती नहीं। हमें पता होना चाहिए कि कब हम तनाव नहीं झेल पा रहे हैं और कब हमें मदद मांगनी चाहिए।

आत्मा को छोड़कर हर विषय की पढ़ाई कर ली

हम सालों-साल सिर्फ एक 'बेस्ट स्टूडेंट' बनने की होड़ में लगे रहते हैं, लेकिन बाद में अहसास होता है कि गले में लटके गोल्ड मेडल के बिना हम खुद को जानते ही नहीं कि हम असल में कौन हैं। हम अधूरा महसूस करते हैं क्योंकि हमने अपनी आत्मा को छोड़कर दुनिया के हर विषय की पढ़ाई कर ली। सबसे बेहतरीन और अंतिम शिक्षा यही है कि यह दुनिया आपको बताए कि आपको क्या चाहिए, उससे पहले आप खुद यह जान लें कि आपके लिए वास्तव में क्या मायने रखता है।

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