पहले हम जाकर व्यवस्था करेंगे…, प्रेमानंद महाराज का बहनजी से भावुक संवाद, देखिए VIDEO
वृंदावन में प्रेमानंद महाराज के केलिकुंज स्थित श्री हित राधाकेलि कुंज आश्रम में एक ऐसा आध्यात्मिक दृश्य देखने को मिला, जिसे देखकर वहां मौजूद हर भक्त भावविभोर हो गया। प्रेमानंद से मिलने कमल बहनजी पहुंची थीं।

वृंदावन में प्रेमानंद महाराज के केलिकुंज स्थित श्री हित राधाकेलि कुंज आश्रम में एक ऐसा आध्यात्मिक दृश्य देखने को मिला, जिसे देखकर वहां मौजूद हर भक्त भावविभोर हो गया। यह क्षण था प्रेमानंद महाराज और महान संत पूज्य भाईजी महाराज (श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार) की कृपापात्र मानी जाने वाली कमल बहनजी के मिलन का। प्रेमानंद महाराज के दर्शन के लिए अनगिनत हस्तियां और भक्त प्रतिदिन आश्रम आते हैं, लेकिन कमल बहनजी का आगमन और उनके बीच हुआ संवाद बेहद खास और सीधे आध्यात्मिक ऊंचाइयों और राधा-कृष्ण के धाम के 'बुलावे' से जुड़ा था।
दोनों संतों के बीच जब बातचीत शुरू हुई तो वह सांसारिक चर्चाओं से परे सीधे 'बुलावे' यानी प्रभु के धाम गोलोक जाने के विषय पर केंद्रित थी। पूज्य कमल बहनजी ने प्रेमानंद महाराज से भावुकता में कहा कि अब वो (भगवान) बुला रहे ना। बहनजी का यह वाक्य उनके नश्वर शरीर को त्यागकर प्रभु के नित्य धाम में प्रवेश करने की इच्छा और तैयारी का संकेत था। इसके उत्तर में प्रेमानंद महाराज का जवाब और भी अधिक मार्मिक और गहरा था, जो उनकी अलौकिक स्थिति और श्रीजी (राधा रानी) के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।
प्रेमानंद महाराज ने मुस्कुराते हुए कहा कि पहले हम जाएंगे, वहाँ श्रीजी और उनकी सखियों से कहकर व्यवस्था करेंगे, तब आप आना। प्रेमानंद महाराज का यह कहना कि 'पहले हम जाएंगे', उनके भक्तों के लिए यह सुनिश्चित करने जैसा था कि बहनजी की यात्रा सुगम हो। 'श्रीजी से कहकर व्यवस्था करेंगे' का अर्थ है कि वह राधा रानी से प्रार्थना करेंगे कि वह उन्हें अपने नित्यधाम में स्थान दें और उनके लिए स्वागत की तैयारी करें। यह संवाद दिखाता है कि दोनों संत मृत्यु को एक अंत नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के साथ नित्य मिलन के उत्सव के रूप में देखते हैं और एक-दूसरे के लिए प्रेमधाम में श्रेष्ठ स्थान सुनिश्चित करना चाहते हैं।
यह दुर्लभ क्षण, जिसमें एक महान संत दूसरे संत की परम गति के लिए अपने इष्ट से पहले जाकर व्यवस्था करने की बात कर रहे हैं, वृंदावन की आध्यात्मिकता और यहां के संतों के निस्वार्थ प्रेम और त्याग की पराकाष्ठा को दर्शा रहा था। इस मिलन और संवाद ने आश्रम में मौजूद सभी भक्तों की आंखें नम कर दीं।




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