Court cannot provide protection to a youth below 21 years of age living in a live-in relationship, High Court orders लिव इन में रहने वाले 21 साल से कम उम्र के युवक को संरक्षण नहीं दे सकती अदालत, हाईकोर्ट का आदेश, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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लिव इन में रहने वाले 21 साल से कम उम्र के युवक को संरक्षण नहीं दे सकती अदालत, हाईकोर्ट का आदेश

अदालत लिव इन में रहने वाले 21 साल से कम उम्र के युवक को संरक्षण नहीं दे सकती है। हाईकोर्ट ने कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत सुरक्षा मिलती रहेगी।

Thu, 14 May 2026 07:06 PMDeep Pandey प्रयागराज, विधि संवाददाता
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लिव इन में रहने वाले 21 साल से कम उम्र के युवक को संरक्षण नहीं दे सकती अदालत, हाईकोर्ट का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि लिव इन रिलेशन में किसी एक साथी की उम्र वैधानिक विवाह आयु से कम है, तो अदालत संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ऐसे संबंध को संरक्षण नहीं दे सकती। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत सुरक्षा मिलती रहेगी।

जस्टिस गरिमा प्रसाद ने 20 वर्षीय मुस्लिम युवती और 19 वर्षीय हिंदू युवक की याचिका पर यह आदेश दिया। दोनों ने दावा किया था कि वे लिव इन रिलेशनशिप में हैं और महिला के परिवार से उन्हें खतरा है। कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम और बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के तहत पुरुष के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला के लिए 18 वर्ष तय है। ऐसे में 21 वर्ष से कम उम्र का पुरुष विवाह के लिए कानूनी क्षमता नहीं रखता।

पीठ ने कहा कि यदि कोई जोड़ा इसलिए लिव इन रिलेशनशिप में रह रहा है क्योंकि कानून उन्हें अभी विवाह की अनुमति नहीं देता, तो ऐसे संबंध को संरक्षण देना अप्रत्यक्ष रूप से एक ‘अवैध विवाह-सदृश व्यवस्था’ को मान्यता देना होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता या बाल विवाह प्रोहिबिशन अधिकारी को कानून के तहत कार्रवाई करने से नहीं रोका जा सकता, बशर्ते वे कानून के दायरे में रहें। याचिका में खतरे से जुड़ी कोई ठोस जानकारी न होने और युवक की उम्र 21 वर्ष से कम होने के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

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श्रावस्ती के जिला कृषि अधिकारी का तीन दिन में करें तबादला

वहीं में हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने आदेश के बावजूद याची कर्मचारी को ज्वाइन न कराने तथा वेतन जारी करने के एवज में जिला कृषि अधिकारी के कार्यालय में रिश्वतखोरी होने के आरोपों के मामले में सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने निदेशक, कृषि को आदेश दिया है कि वह तीन दिन में श्रावस्ती के जिला कृषि अधिकारी बलजीत बहादुर वर्मा का जिले के बाहर तबादला करें। इसके साथ ही न्यायालय ने उक्त अधिकारी व याची कर्मचारी के एक कथित बातचीत के संबंध में सीडीआर प्रस्तुत करने का भी आदेश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय व न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कर्मचारी महेंद्र प्रताप सिंह की विशेष अपील पर पारित किया। कर्मचारी ने अपने निलंबन आदेश को चुनौती दी थी। न्यायालय ने 5 फरवरी को निलंबन आदेश पर रोक लगाते हुए, कर्मचारी को वेतन-भत्तों का लाभ देने का आदेश दिया था।

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