पति को नपुंसक बताना मानहानि नहीं, पत्नी को हाईकोर्ट से राहत
पति को नपुंसक बताना मानहानि नहीं है। महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए अहम फैसला सुनाया। मेडिकल रिपोर्ट सही साबित होने पर हाईकोर्ट ने पत्नी को दी राहत।

High Court News: इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने पति-पत्नी से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया है कि जब इसके साक्ष्य मौजूद हो, मेडिकल रिपोर्ट भी हो तो पति को नपुंसक बताए जाने पर पत्नी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा नहीं किया जा सकता है। दरअसल, गुरुवार को हाईकोर्ट एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में पति की तरफ से लगाए गए मानहानि के मामले में निचली अदालत से आए आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट में निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए महिला को राहत दी है।
दरअसल, महिला ने यह याचिका मानहानि मामले जारी समन के खिलाफ हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। पत्नी ने अपने पति को नपुंसक बताया था। पति ने पत्नी पर आरोप लगाया था कि पत्नी ने उसे नपुंसक बताकर उसकी छवि को धूमिल किया। यह आरोप लगाते हुए पति ने मानहानि का मुकदमा दर्ज किया था। ट्रायल कोर्ट ने पति की तरफ से अपनी पत्नी याची महिला के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने महिला को समन आदेश जारी किया था। इसके महिला इसे चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। पत्नी ने कोर्ट में दलील दी कि उसने जो आरोप लगाए वो वास्तविक तथ्यों पर आधारित हैं।
यदि पत्नी ने पति को नपुंसक बताया है और मेडिकल साक्ष्य भी हैं
इस मामले में गुरुवार को हाईकोर्ट ने महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सभी पक्षों को सुनने के बाद महत्वपूर्ण फैसला किया है। पत्नी द्वारा दिया गया ऐसा बयान पति के प्रति द्वेष के बिना सद्भाव से दिया गया है और उसके बयान की पुष्टि पति की मेडिकल जांच रिपोर्ट से होती है। हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि पत्नी ने पति को नपुंसक बताया है और मेडिकल साक्ष्य भी हैं, जो शादी के पूर्ण न होने जैसे तथ्यों पर आधारित है, तो इसे मानहानि नहीं माना जा सकता।
समन आदेश को रद्द करते हुए याचिका को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया
याचिका की सुनवाई करते हुए सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर सही ढंग से विचार नहीं किया, इसलिए समन आदेश को रद्द करते हुए याचिका को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने महिला को राहत दी है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ऐसी परिस्थिति तलाक के लिए वैध आधार बन सकती है।




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