Allahabad High Court has held that divorce decree cannot be unilaterally set aside after death either husband or wife पति या पत्नी की मृत्यु के बाद एक पक्षीय रद्द नहीं हो सकती तलाक की डिक्री: हाईकोर्ट, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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पति या पत्नी की मृत्यु के बाद एक पक्षीय रद्द नहीं हो सकती तलाक की डिक्री: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पति या पत्नी की मृत्यु के बाद एक पक्षीय तलाक की डिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मुकदमा आगे नहीं बढ़ सकता और इसे पुनर्जीवित करना कानूनन संभव नहीं है।

Mon, 23 March 2026 09:58 PMDinesh Rathour प्रयागराज, विधि संवाददाता
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पति या पत्नी की मृत्यु के बाद एक पक्षीय रद्द नहीं हो सकती तलाक की डिक्री: हाईकोर्ट

Prayagraj News: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पति या पत्नी की मृत्यु के बाद एक पक्षीय तलाक की डिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मुकदमा आगे नहीं बढ़ सकता और इसे पुनर्जीवित करना कानूनन संभव नहीं है। गीता देवी व अन्य बनाम माया देवी व अन्य के मामले में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने परिवार न्यायालय का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें 30 साल पुराने तलाक को बहाल कर दिया गया था।

मामले में पहली पत्नी का विवाह 1991 में एक पक्षीय डिक्री के जरिए समाप्त हो गया। इसके बाद पति ने दूसरी शादी कर ली और अलग परिवार के साथ रहने लगा। वर्ष 2023 में पति की मृत्यु के बाद दूसरी पत्नी को वैध विधवा मानते हुए उसे सभी सेवा लाभ दिए गए। इसके बाद पहली पत्नी ने भी लाभ पाने के लिए दावा किया और परिवार न्यायालय में एक पक्षीय डिक्री रद्द करने की मांग की। फैमिली कोर्ट ने देरी माफ करते हुए डिक्री रद्द कर दी, जिसे दूसरी पत्नी और उसके बच्चों ने हाइकोर्ट में चुनौती दी।

हाइकोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी ने डिक्री को चुनौती देने के लिए 30 साल से अधिक समय तक कोई कदम नहीं उठाया और यह आवेदन पति की मृत्यु के तुरंत बाद किया गया, जिससे उसकी मंशा पर भी सवाल उठता है। कोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी यह साबित नहीं कर पाई कि उसे तलाक की कार्यवाही की सूचना नहीं दी गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार पति या पत्नी की मृत्यु के बाद वैवाहिक विवाद समाप्त हो जाता है और उसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

अदालत ने कहा, ‘ऐसे हालात में पुराने मुकदमे को बहाल करने से दूसरी पत्नी का वैध अधिकार प्रभावित होता है, जबकि उसे अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं मिलेगा।’ हाइकोर्ट ने यह भी माना कि तलाक के बाद हुई दूसरी शादी पूरी तरह वैध थी। इन सभी तथ्यों को देखते हुए अदालत ने दूसरी पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए परिवार न्यायालय का आदेश रद्द कर दिया।

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