पेंशनर्स का दर्द का कब समझोगे सरकार
जिले में सेवानिवृत्त कर्मचारियों के मन में एक बार फिर गहरी बेचैनी है। वर्षों तक सरकारी सेवा कर जीवन का सबसे सक्रिय समय देश और समाज को देने के बाद जब सम्मानजनक जीवन का सहारा पेंशन बनती है। तब उसी पेंशन को लेकर असमंजस और अनिश्चितता पैदा होना पेंशनरों के लिए सबसे बड़ा मानसिक बोझ बन जाता है।
हाल ही में जारी आठवें केंद्रीय वेतन आयोग से संबंधित अधिसूचना ने अलीगढ़ सहित प्रदेशभर के पेंशनरों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उनकी दशकों की सेवा का मूल्य अब धीरे-धीरे भुलाया जा रहा है। पेंशन, जो बुढ़ापे की सुरक्षा और आत्मसम्मान का आधार है, आज नीति और प्रक्रियाओं के बीच उलझती दिखाई दे रही है। केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा तीन नवंबर 2025 को जारी अधिसूचना के अनुसार आठवें केंद्रीय वेतन आयोग का गठन किया गया है। इस अधिसूचना में आयोग के कार्यक्षेत्र और संदर्भ की शर्तें स्पष्ट की गई हैं, लेकिन इन्हीं शर्तों में पेंशनरों से जुड़ा सबसे संवेदनशील विषय लगभग उपेक्षित नजर आ रहा है। विशेष रूप से एक जनवरी 2026 से पहले सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारियों की पेंशन के पुनरीक्षण को आयोग की परिधि से बाहर रखे जाने की बात ने पेंशनरों में निराशा और असंतोष को जन्म दिया है।
हिन्दुस्तान समाचार पत्र के अभियान बोले अलीगढ़ के तहत टीम ने बुधवार को जिले के पेंशनरों से संवाद किया। इस दौरान उन्होंने अपनी पीड़ा बताई। कहा कि दस्तावेजों में उल्लेख है कि अधिकांश राज्य सरकारें केंद्रीय वेतन आयोग की संस्तुतियों को आधार बनाकर अपने कर्मचारियों और पेंशनरों की वेतन-पेंशन नीतियां निर्धारित करती हैं। ऐसे में अगर केंद्र स्तर पर पुराने पेंशनरों की पेंशन पर विचार नहीं किया जाता, तो इसका प्रतिकूल प्रभाव राज्यों के लाखों पेंशनरों पर भी पड़ना तय है। पेंशनरों का मानना है कि यह केवल केंद्र का मामला नहीं, पूरे सरकारी तंत्र से जुड़े करोड़ों सेवानिवृत्त कर्मचारियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।
उन्होंने बताया कि अधिसूचना के अनुसार एक जनवरी 2026 के बाद सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों की पेंशन के पुनरीक्षण के लिए वेतन के काल्पनिक आकलन के आधार पर संस्तुतियां दिए जाने की अपेक्षा की गई है। लेकिन, इससे पहले सेवानिवृत्त कर्मचारियों को इस प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है। पेंशनरों का तर्क है कि अगर सेवानिवृत्ति के समय प्राप्त वेतन का पुनरीक्षण नई तिथि के मूल्य स्तर के अनुसार किया जा सकता है, तो उसी आधार पर पेंशन का पुनरीक्षण भी किया जाना पूरी तरह न्यायसंगत है। पेंशनरों ने कहा कि पेंशन कोई अनुग्रह या दान नहीं, सेवा काल में किए गए श्रम का स्थगित प्रतिफल है। न्यायालयों द्वारा भी पेंशन को कर्मचारी का वैधानिक अधिकार माना गया है। इसके बावजूद पेंशन को अलग कर इसे सरकार पर अतिरिक्त बोझ बताने की सोच पेंशनरों को अस्वीकार्य लगती है। उनका कहना है कि वेतन और पेंशन दोनों ही सरकार की अनिवार्य जिम्मेदारी हैं, जिनके लिए हर वर्ष बजट में प्रावधान किया जाता है और जिन्हें विधानमंडल की स्वीकृति प्राप्त होती है।
पुरानी पेंशन व्यवस्था के अंतर्गत मिलने वाली पेंशन को गैर-अंशदायी बताते हुए पेंशनरों ने कहा कि इसका भुगतान सरकार का कानूनी दायित्व है। पेंशन को सामाजिक न्याय से जोड़ते हुए यह भी कहा गया है कि यह केवल पिछली सेवाओं का पुरस्कार नहीं, वृद्धावस्था में सम्मानजनक जीवन, स्वास्थ्य देखभाल और बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने का आधार है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे चिकित्सा और देखभाल पर खर्च भी बढ़ता जाता है, ऐसे में पेंशन का समय-समय पर संशोधन बेहद जरूरी हो जाता है।
कहा कि देश की अर्थव्यवस्था लगातार सुदृढ़ हो रही है। जिन कर्मचारियों ने अपने सक्रिय कार्यकाल में देश की प्रगति और आर्थिक मजबूती में योगदान दिया, उन्हें विकास के लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। पिछले सभी वेतन आयोगों में सेवारत कर्मचारियों के साथ-साथ मौजूदा पेंशनरों की पेंशन में संशोधन की संस्तुतियां की जाती रही हैं, लेकिन इस बार संदर्भ की शर्तों में पेंशन का स्पष्ट उल्लेख न होना पेंशनरों के लिए गहरी चिंता का विषय बन गया है। मांग की आठवें केंद्रीय वेतन आयोग की संदर्भ शर्तों पर पुनर्विचार किया जाए और संशोधित शर्तों की सूची जारी कर मौजूदा पेंशनरों की पेंशन के पुनरीक्षण को भी इसमें शामिल किया जाए। कहा कि यही कदम सेवानिवृत्त कर्मचारियों के प्रति सम्मान, न्याय और सामाजिक सुरक्षा की भावना को सुदृढ़ कर सकता है।
शिकायत
-पुराने पेंशनरों को वेतन आयोग की प्रक्रिया से बाहर रखा जाना सबसे बड़ी शिकायत है।
-महंगाई बढ़ने के बावजूद पेंशन में कोई वास्तविक सुधार नहीं किया जा रहा।
-दवा और इलाज के खर्च के अनुपात में पेंशन बेहद कम साबित हो रही है।
-पेंशन संबंधी फैसलों में पेंशनरों की राय नहीं ली जाती।
-पेंशन को सरकारी बोझ की तरह प्रस्तुत किया जाना अपमानजनक है।
-पेंशन पुनरीक्षण में वर्षों तक देरी से आर्थिक संकट बढ़ता जा रहा है।
-स्पष्ट नीति के अभाव में पेंशनरों में भ्रम और असंतोष बना हुआ है।
-राज्य और केंद्र की अलग-अलग व्यवस्था से पेंशनरों को परेशानी होती है।
-शिकायतों के निस्तारण के लिए प्रभावी व्यवस्था मौजूद नहीं है।
-सेवानिवृत्त कर्मचारियों के योगदान को नजरअंदाज किया जा रहा है।
सुझाव
-सभी पेंशनरों को वेतन आयोग के दायरे में समान रूप से शामिल किया जाए।
-पेंशन को महंगाई सूचकांक से जोड़कर नियमित संशोधन किया जाए।
-वरिष्ठ नागरिकों के लिए अतिरिक्त चिकित्सा सहायता पेंशन से जोड़ी जाए।
-पेंशन नीति बनाने से पहले पेंशनर संगठनों से संवाद किया जाए।
-पेंशन को अधिकार और सामाजिक सुरक्षा के रूप में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए।
-पेंशन पुनरीक्षण की समयबद्ध और पारदर्शी प्रक्रिया तय की जाए।
-पेंशन नियमों को सरल हिंदी में स्पष्ट रूप से जारी किया जाए।
-केंद्र और राज्य की पेंशन नीतियों में समन्वय स्थापित किया जाए।
-हर जिले में पेंशन सहायता और शिकायत केंद्र खोले जाएं।
-सेवानिवृत्त कर्मचारियों के योगदान को सम्मानपूर्वक मान्यता दी जाए।
रेलवे में वरिष्ठ नागरिकों को फिर से मिले छूट
कलक्ट्रेट सभागार में बुधवार को पेंशनर दिवस का आयोजन किया गया। जिसमें विभिन्न विभागों के कार्यालयाध्यक्षों, प्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में पेंशनरों ने भाग लिया। इस दौरान पेंशनर संगठनों के पदाधिकारियों ने पेंशनरों से जुड़ी समस्याओं और मांगों को प्रमुखता से उठाया। पेंशनर संगठनों ने चिकित्सा प्रतिपूर्ति के दावों का समय पर भुगतान न होने पर नाराजगी जताई। इसके साथ ही कोरोना काल के महंगाई भत्ते का भुगतान, वरिष्ठ नागरिकों को रेलवे में पुनः रियायत देने, बैंकों और अस्पतालों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से काउंटर स्थापित किए जाने की मांग की गई। पेंशनर संगठनों के अध्यक्षों ने अलीगढ़ मंडल मुख्यालय पर अपर निदेशक एवं कोषागार की नियुक्ति होने पर कार्यालय स्थापित किए जाने की भी मांग उठाई। इन सभी मांगों से संबंधित ज्ञापन अपर जिलाधिकारी नगर किंशुक श्रीवास्तव को सौंपा गया।
सेवानिवृत्त अपर जिलाधिकारी नवाब अली ने कहा कि कोषागार में पेंशनरों की पेंशन में 65 वर्ष की आयु के बाद प्रत्येक वर्ष पांच प्रतिशत वृद्धि किए जाने की आवश्यकता है। वरिष्ठ कोषाधिकारी योगेश कुमार ने पेंशनरों को आश्वस्त करते हुए कहा कि पेंशन व चिकित्सा प्रतिपूर्ति से संबंधित किसी भी समस्या के समाधान के लिए पेंशनर किसी भी समय कोषागार कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं। अपर जिलाधिकारी (नगर) किंशुक श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में पेंशनरों से सदैव प्रसन्न रहने और हंसते-मुस्कराते हुए जीवन जीने की अपील की। उन्होंने कहा कि पेंशनर समाज का अनुभवी और सम्मानित वर्ग हैं, जिनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा। इस मौके पर लेखाकार गिर्राज किशोर, सुधीर कुमार शर्मा, लाखन सिंह, नितिन टंडन, राजकुमार, मुकेश कुमार, राजीव कुमार, पुष्पेंद्र कुमार आदि मौजूद रहे।
बोले लोग
सरकारी नौकरी में हमने अपना पूरा जीवन लगा दिया। आज जब उम्र के इस पड़ाव पर पेंशन ही एकमात्र सहारा है, तब उसमें सुधार न होना बहुत पीड़ादायक है। बढ़ती महंगाई में बुजुर्गों का जीवन लगातार कठिन होता जा रहा है।
शोभा शर्मा
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वेतन आयोग की चर्चा होते ही उम्मीद जगती है, लेकिन पुराने पेंशनरों को बाहर रखने की बात निराश करती है। सेवानिवृत्ति की तारीख के आधार पर भेदभाव करना उचित नहीं है। सभी पेंशनरों को समान रूप से न्याय मिलना चाहिए।
शकुंतला देवी
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पेंशन कोई दया नहीं बल्कि हमारे वर्षों के श्रम का अधिकार है। सेवा काल में हमने पूरी ईमानदारी से काम किया। आज बुढ़ापे में सम्मानजनक जीवन जीने की मांग करना गलत कैसे हो सकता है।
मीना सिंह
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दवाइयों, इलाज और घरेलू खर्चों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। मौजूदा पेंशन में गुजारा करना मुश्किल हो गया है। अगर समय पर पेंशन का पुनरीक्षण नहीं हुआ तो बुजुर्गों की समस्याएं और बढ़ेंगी।
गजराज शर्मा
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सरकार विकास की बात करती है, लेकिन उस विकास का लाभ पेंशनरों तक नहीं पहुंच रहा। जिन्होंने अपने कार्यकाल में देश की सेवा की, उन्हें वृद्धावस्था में आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है।
राम खिलाड़ी सारस्वत
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हर वेतन आयोग में पहले पेंशनरों को भी लाभ दिया गया है। इस बार नियमों में पेंशन का स्पष्ट उल्लेख न होना चिंता बढ़ाता है। इससे पेंशनरों को खुद को उपेक्षित महसूस हो रहा है।
गौरी शंकर गौतम
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बुढ़ापे में आमदनी के साधन खत्म हो जाते हैं। ऐसे में पेंशन ही जीवन की रीढ़ होती है। अगर वही पर्याप्त नहीं होगी, तो बुजुर्गों को दूसरों पर निर्भर होना पड़ेगा, जो आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है।
वी.के. गुप्ता
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सेवानिवृत्त कर्मचारी भी उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, जिसने देश को आगे बढ़ाया। केवल वर्तमान कर्मचारियों पर ध्यान देना और पुराने पेंशनरों को भूल जाना सामाजिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।
इं. एसी वार्ष्णेय
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आज की महंगाई में बिजली, पानी, राशन और इलाज का खर्च संभालना कठिन हो गया है। पेंशन में संशोधन न होना सीधे तौर पर बुजुर्गों के जीवन स्तर को प्रभावित कर रहा है।
ओम प्रकाश शर्मा
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सरकार को यह समझना चाहिए कि पेंशन कोई अतिरिक्त बोझ नहीं है। यह पहले से तय जिम्मेदारी है। पेंशनरों को नजरअंदाज करने से व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होता है।
सुरेंद्र पाठक
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वृद्धावस्था में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ जाती हैं। अस्पताल और दवाओं का खर्च लगातार बढ़ रहा है। अगर पेंशन में सुधार नहीं हुआ, तो इलाज कराना भी कई लोगों के लिए मुश्किल हो जाएगा।
राम निवास सविता
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देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, ऐसा कहा जाता है। लेकिन इसका असर पेंशनरों की जेब पर दिखाई नहीं देता। विकास का लाभ सभी वर्गों तक पहुंचना चाहिए, न कि केवल सीमित लोगों तक।
महेश कुमार मिश्र
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सेवा के दौरान हमने कभी सरकार से अतिरिक्त सुविधा की मांग नहीं की। अब बुढ़ापे में केवल इतना चाहते हैं कि पेंशन सम्मानजनक जीवन के लिए पर्याप्त हो सके।
सुरेंद्र गुप्ता
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पेंशन को लेकर स्पष्ट नीति न होने से भ्रम और असंतोष बढ़ रहा है। सरकार को चाहिए कि पेंशनरों की स्थिति को समझे और समय रहते उचित निर्णय ले।
देव शर्मा
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पुरानी पेंशन व्यवस्था के तहत मिलने वाली पेंशन सरकार की जिम्मेदारी है। इसे बोझ मानना गलत सोच है। यह सामाजिक सुरक्षा का मजबूत आधार है।
अशोक शर्मा
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पेंशन में सुधार न होने से कई बुजुर्ग आर्थिक तनाव में जी रहे हैं। परिवार पर निर्भरता बढ़ रही है, जिससे मानसिक दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
मलखान सिंह
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हमने अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा सरकारी सेवा में बिताया। अब यह उम्मीद करना कि सरकार बुढ़ापे में हमारा सहारा बनेगी, कोई अनुचित मांग नहीं है।
कुमरपाल सिंह
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वेतन आयोग की सिफारिशों में पेंशनरों को शामिल न करना निराशाजनक है। इससे ऐसा लगता है जैसे सेवानिवृत्त कर्मचारी व्यवस्था के लिए अब महत्व नहीं रखते।
प्रह्लाद सिंघल
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पेंशन केवल आर्थिक सहायता नहीं सम्मान का प्रतीक है। जब पेंशन पर्याप्त नहीं होती, तो बुजुर्गों का आत्मसम्मान भी प्रभावित होता है। सरकार को चाहिए कि वह पुराने पेंशनरों के अनुभव और योगदान का सम्मान करे।
बाला शर्मा
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पेंशन किसी वर्ग विशेष की नहीं सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था है। सरकार को पेंशनरों की समस्याओं को कागजों में नहीं, जमीन पर देखकर समझना चाहिए। तभी सही निर्णय लिया जा सकता है।
राज दुलारी
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अगर पेंशन का पुनरीक्षण नहीं हुआ, तो आने वाले समय में बुजुर्गों की आर्थिक स्थिति और खराब हो सकती है। बढ़ती उम्र के साथ खर्च बढ़ते हैं, लेकिन आय स्थिर रहती है। यही कारण है कि पेंशन का समय-समय पर संशोधन बेहद जरूरी हो जाता है।
सुषमा देवी
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पेंशनरों को बार-बार अपनी मांगों के लिए आवाज उठानी पड़ती है। यह स्थिति बताती है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। सरकार को भविष्य को देखते हुए निर्णय लेना चाहिए।
एस डी शर्मा
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