44 साल बाद हत्या के आरोप से बरी हुआ आरोपी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की उम्रकैद की सजा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 में एटा में हुई गोली मारकर हत्या और जला देने के मामले में जीवित बचे एकमात्र आरोपी जाहर सिंह को 44 साल बाद संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है।

Allahabad Highcourt: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 में एटा में हुई गोली मारकर हत्या और जला देने के मामले में जीवित बचे एकमात्र आरोपी जाहर सिंह को 44 साल बाद संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। साथ ही सेशन कोर्ट से मिली उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। यह निर्णय न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति जेके उपाध्याय की खंडपीठ ने महाराज सिंह व अन्य की अपील पर उसके अधिवक्ता उपेंद्र उपाध्याय और सरकारी वकील को सुनने के बाद दिया है। अन्य अपीलार्थियों की अपील लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो चुकी है।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन संदेह से परे अपराध साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि अपीलार्थी ने देशी पिस्तौल से फायर किया था। उसके हत्या में लिप्त होने के सबूत नहीं मिले। सेशन कोर्ट ने भी सीआरपीसी की धारा 313 में दर्ज आरोपी के बयान को समझने में गलती की और उसे आईपीसी की धारा 149 में हत्या के सामान्य आशय के अपराध का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
मामले के तथ्यों के अनुसार 17/18 अप्रैल 1982 की आधी रात अभियुक्तों ने असलहे से लैस होकर अभीरतपुर गांव में शिकायतकर्ता अमर सिंह के घर पर धावा बोल दिया। उन्होंने कुल्हाड़ी से दरवाजा तोड़ दिया तो राम नारायण भागा। हमलावरों ने पीछा कर उसे घेर लिया और गोली मारकर आग के हवाले कर दिया। इस दौरान शिकायतकर्ता की मौसी रामकली भी घायल हो गई, जिनकी बाद में मृत्यु हो गई। दूसरे दिन 18 अप्रैल 1982 को एटा के जैठरा थाने में घटना की एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस की चार्जशीट पर ट्रायल के बाद सेशन कोर्ट ने अपीलार्थियों को सामान्य उद्देश्य से हत्या का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसे अपील में चुनौती दी गई थी।




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