भ्रष्टाचार के मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों की भी तय हो जवाबदेही, हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में प्रदेश के मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वह स्वीकार करें कि अब समय आ गया है जब राज्य सरकार को सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी (वरिष्ठ जिम्मेदारी) का सिद्धांत विकसित करना चाहिए।

Allahabad Highcourt Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में प्रदेश के मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वह स्वीकार करें कि अब समय आ गया है जब राज्य सरकार को सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी (वरिष्ठ जिम्मेदारी) का सिद्धांत विकसित करना चाहिए। इसके तहत मातहतों के भ्रष्टाचार, लापरवाही या अदालती आदेशों की अवहेलना करने पर उनके वरिष्ठ अधिकारियों को भी प्रशासनिक और आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने अवनेश कुमार अग्रवाल की याचिका को स्वीकार करते हुए और उनके पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए एनओसी जारी करने का आदेश करते हुए की है। कोर्ट ने कहा कि राज्य को उच्च ज़िम्मेदारी का सिद्धांत अपनाना चाहिए, जिसके तहत प्रशासनिक पदानुक्रम में वरिष्ठ अफ़सरों को जवाबदेह ठहराया जाता है। कोर्ट ने आगे कहा कि उचित मामलों में उन्हें अपने अधीन काम करने वालों द्वारा किए गए गलत कामों को रोकने या दंडित करने में उनकी विफलता के लिए आपराधिक रूप से भी ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। वरिष्ठ अफ़सरों को अपने अधीन काम करने वालों के आचरण और प्रदर्शन के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए क्योंकि सार्वजनिक सेवाओं की प्रभावी डिलीवरी सुनिश्चित करना उनकी पेशेवर और प्रशासनिक, दोनों तरह की ज़िम्मेदारी है।
कोर्ट ने संस्थागत पतन के दो अलग-अलग रूपों के प्रति आगाह किया। पहला, मन का भ्रष्टाचार जिसके तहत आधिकारिक सत्ता की आड़ में निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया को जानबूझकर विकृत किया जाता है। दूसरा, पैसे का भ्रष्टाचार जिसके तहत सार्वजनिक पद को व्यक्तिगत आर्थिक लाभ का ज़रिया बना लिया जाता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी जवाबदेही को वैध रूप से आपराधिक दायित्व तक बढ़ाया जा सकता है, जहां रोकने या दंडित करने में विफलता के कारण भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, रिकॉर्ड को जानबूझकर छिपाना, सरकारी आदेशों और राजपत्र अधिसूचनाओं की अवमानना और राज्य की नीतियों तथा कार्यक्रमों (जैसे कि संगठित और संस्थागत भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति) को लागू करने में विफलता जैसे आपराधिक कृत्य होते हैं।
इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि एक पुराने फैसले (मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) में कोर्ट ने राज्य सरकार को भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामलों की जांच की लगातार निगरानी के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हाई-पावर कमेटी बनाने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इस समिति का गठन छह महीने के भीतर हो जाना चाहिए था लेकिन सरकार ने इसमें करीब दो साल की देरी की। कोर्ट ने इस मौजूदा मामले में सख्त रुख अपनाया और मुख्य सचिव कार्यालय से जवाब मांगा, तब जाकर दिसंबर 2025 में इस समिति का गठन किया गया और इसकी बैठकें शुरू हुईं।
कोर्ट ने कहा कि कुछ सरकारी अधिकारियों की मानसिकता समावेशी नहीं होती। वे केवल अपने विशेषाधिकारों और विवेकाधीन शक्तियों को बचाए रखना चाहते हैं, जिससे लालफीताशाही को बढ़ावा मिलता है। नियमों का उद्देश्य ही इन असीमित शक्तियों को सीमित करना और पारदर्शिता लाना है। कोर्ट ने कहा कि उसके पास मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने या उन्हें व्यक्तिगत रूप से तलब करने के पूरे अधिकार थे, लेकिन न्यायिक संयम बरतते हुए ऐसा नहीं किया गया। कोर्ट ने इस बात पर भी अफसोस जताया कि मामले का आदेश सुरक्षित रखने के बाद भी तीन महीने तक समिति की प्रगति रिपोर्ट का इंतजार किया गया लेकिन सरकारी वकीलों द्वारा कोई जानकारी नहीं दी गई।
आदेश मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश
कोर्ट ने रजिस्ट्रार कंप्लायंस को इस आदेश की प्रमाणित प्रति तुरंत प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजने का निर्देश दिया। साथ ही मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि इस आदेश को मुख्यमंत्री के समक्ष अवलोकन और विचार के लिए प्रस्तुत करें ताकि प्रशासन में सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी के सिद्धांत को लागू करने और भ्रष्ट या लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ सख्त जवाबदेही तंत्र विकसित करने पर गंभीरता से काम किया जा सके।
यह है मामला
अवनेश कुमार अग्रवाल के खिलाफ वर्ष 2007 में बिजनौर जिले में भ्रष्टाचार, जालसाजी और सरकारी रिकॉर्ड को आग लगाकर नष्ट करने के आरोपों में दो एफआईआर दर्ज की गई थीं। इस मामले में व्यापार कर विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी और कारोबारी शामिल थे। याची का कहना था कि इस मामले की जांच में लगभग 18 साल की अत्यधिक देरी हुई और चार्जशीट 2024 में दाखिल की गई। इस देरी के कारण हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने पहले ही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद बरेली की विशेष अदालत ने 20 सितंबर 2025 को याची के पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने विशेष अदालत बरेली के इस आदेश को रद्द करते हुए याची के पक्ष में एनओसी जारी करने का निर्देश दिया है।




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