व्हाट्सएप पर वायरल NEET गेस पेपर; कैसे शुरू हुआ और क्यों बढ़ा विवाद?
3 मई 2026 को देशभर में आयोजित मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET के बाद एक कथित “गेस पेपर” को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर वायरल हुई इस पीडीएफ ने छात्रों, अभिभावकों और कोचिंग संस्थानों के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

3 मई 2026 को देशभर में आयोजित मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET के बाद एक कथित “गेस पेपर” को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर वायरल हुई इस पीडीएफ ने छात्रों, अभिभावकों और कोचिंग संस्थानों के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं। राजस्थान स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) ने मामले की जांच शुरू कर दी है, लेकिन फिलहाल इसे “पेपर लीक” कहना जल्दबाज़ी बताया जा रहा है। आइए समझते हैं पूरा मामला।
क्या है ‘गेस पेपर’ विवाद?
परीक्षा से पहले करीब 150 पन्नों की एक पीडीएफ व्हाट्सएप पर बड़े पैमाने पर शेयर की गई थी। इसे “गेस पेपर” बताया गया था। जांच एजेंसियों के अनुसार इस पीडीएफ में कुल 410 प्रश्न थे। दावा किया जा रहा है कि इनमें से लगभग 120 प्रश्न, खासकर केमिस्ट्री विषय से, वास्तविक परीक्षा में पूछे गए।
यही समानता इस पूरे विवाद का केंद्र है। अगर इतने बड़े पैमाने पर प्रश्न मेल खाते हैं, तो यह सामान्य अनुमान (guess) है या किसी अंदरूनी जानकारी का परिणाम—यही जांच का मुख्य बिंदु है।
एसओजी क्या कह रही है?
राजस्थान SOG के एडीजी विशाल बंसल के अनुसार, जांच अभी शुरुआती चरण में है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि इस मामले को अभी “पेपर लीक” कहना सही नहीं होगा। उनका तर्क है कि अगर यह वास्तविक पेपर लीक होता, तो इतनी खुली तरह से व्हाट्सएप ग्रुप्स में बड़े स्तर पर सर्कुलेट होना संदिग्ध लगता है।
SOG फिलहाल यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि:
इस गेस पेपर को किसने तैयार किया
इसे पहली बार कहां से शेयर किया गया
यह किन-किन ग्रुप्स और व्यक्तियों तक पहुंचा
कितना पुराना है यह गेस पेपर?
जांच में सामने आया है कि यह पीडीएफ करीब एक महीने से छात्रों के बीच घूम रही थी। सैकड़ों व्हाट्सएप ग्रुप्स में इसे साझा किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि यह अचानक लीक नहीं हुआ, बल्कि पहले से तैयार सामग्री थी।
देहरादून लिंक क्या है?
जांच के दौरान देहरादून से जुड़ा एक लिंक सामने आया है। वहां के एक व्यक्ति से पूछताछ की जा रही है। हालांकि अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। SOG इस कड़ी को महत्वपूर्ण मानते हुए इसकी गहराई से जांच कर रही है।
क्या यह पेपर लीक है?
इस सवाल का जवाब अभी स्पष्ट नहीं है। कानूनी और तकनीकी रूप से “पेपर लीक” साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी होता है कि असली प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले अवैध तरीके से बाहर आया था।
वहीं, “गेस पेपर” कोचिंग संस्थानों या विशेषज्ञों द्वारा संभावित प्रश्नों के आधार पर तैयार किए जाते हैं। कभी-कभी ये प्रश्न वास्तविक परीक्षा से मेल भी खा जाते हैं।
इस मामले में:
प्रश्नों की संख्या अधिक है (410)
कुछ सवालों का मिलान हो रहा है
लेकिन यह साबित नहीं हुआ कि असली पेपर पहले लीक हुआ था
इसीलिए जांच एजेंसी अभी सावधानी से आगे बढ़ रही है।
तकनीकी जांच क्यों मुश्किल है?
डिजिटल कंटेंट का स्रोत ट्रेस करना आसान नहीं होता। व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म पर मैसेज एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड होते हैं।
SOG के अनुसार:
मैसेज की ओरिजिन ट्रैक करना समय लेने वाला काम है
कई बार फॉरवर्ड की लंबी चेन होती है
असली स्रोत तक पहुंचने के लिए साइबर फॉरेंसिक तकनीकों का इस्तेमाल करना पड़ता है
आगे क्या होगा?
अंतिम निर्णय परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी ही लेगी कि मामला पेपर लीक का है या नहीं। SOG अपनी जांच रिपोर्ट के आधार पर तथ्य सामने रखेगी।
यदि जांच में गड़बड़ी साबित होती है, तो:
संबंधित लोगों पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है
परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं
जरूरत पड़ने पर दोबारा परीक्षा जैसे कदम भी संभव हैं
फिलहाल, एजेंसियां हर पहलू तकनीकी, साइबर और मानव नेटवर्क की जांच कर रही हैं।
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