राजस्थान यूथ कांग्रेस चुनाव में घुसपैठ का दावा! वोटिंग लिस्ट में विरोधी नेताओं के नाम से हड़कंप
राजस्थान की राजधानी जयपुर से उठी एक खबर ने यूथ कांग्रेस के ऑनलाइन चुनाव को रहस्य, शक और सियासी सनसनी के भंवर में ला खड़ा किया है। मोबाइल ऐप के जरिए चल रही वोटिंग प्रक्रिया के बीच अचानक कुछ ऐसे नाम सामने आए

राजस्थान की राजधानी जयपुर से उठी एक खबर ने यूथ कांग्रेस के ऑनलाइन चुनाव को रहस्य, शक और सियासी सनसनी के भंवर में ला खड़ा किया है। मोबाइल ऐप के जरिए चल रही वोटिंग प्रक्रिया के बीच अचानक कुछ ऐसे नाम सामने आए, जिन्होंने राजनीतिक गलियारों में हलचल नहीं बल्कि बेचैनी पैदा कर दी। दावा किया गया कि जिन नेताओं की विचारधारा कांग्रेस से बिल्कुल अलग है, उनके नाम से भी यूथ कांग्रेस में वोटिंग हो चुकी है।
इस पूरे घटनाक्रम ने चुनावी सिस्टम की सुरक्षा पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
जब स्क्रीन पर चमके ‘चौंकाने वाले नाम’
यूथ कांग्रेस में अध्यक्ष, महासचिव, जिला अध्यक्ष और विधानसभा अध्यक्ष जैसे पदों के लिए ऑनलाइन मतदान जारी है। सबकुछ सामान्य दिखाई दे रहा था, लेकिन फिर अचानक एक ऐसा खुलासा हुआ जिसने सियासी पारा बढ़ा दिया।
बताया गया कि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के प्रमुख और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल के नाम से वोटिंग दर्ज हुई। मामला यहीं नहीं रुका। थोड़ी ही देर बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद सुमेधानंद सरस्वती का नाम भी सामने आ गया।
अब सवाल सिर्फ वोटिंग का नहीं था… सवाल यह था कि आखिर यह ‘डिजिटल दरवाजा’ खुला कैसे?
ओटीपी का रहस्य और सिस्टम पर उठती उंगलियां
यूथ कांग्रेस का यह चुनाव पूरी तरह ऐप आधारित है। सदस्यता लेने के लिए मोबाइल नंबर जरूरी है और वोटिंग से पहले ओटीपी वेरिफिकेशन अनिवार्य बताया जाता है। लेकिन पूरे विवाद का सबसे रहस्यमय पहलू यही बन गया है।
दावा किया जा रहा है कि दोनों नेताओं के असली मोबाइल नंबर का उपयोग करते हुए सदस्यता और वोटिंग की गई। अब राजनीतिक हलकों में एक ही फुसफुसाहट सुनाई दे रही है—अगर नंबर असली थे, तो ओटीपी किसने डाला?
क्या किसी ने सिस्टम की सुरक्षा को भेद दिया?
क्या चुनावी डेटा किसी गलत हाथ तक पहुंच गया?
या फिर पर्दे के पीछे कोई ‘डिजिटल ऑपरेशन’ चल रहा था?
इन सवालों के जवाब अभी धुंध में छिपे हुए हैं, लेकिन चर्चाओं का तूफान तेज हो चुका है।
अंदरखाने से फूटा ‘डेटा बम’
यूथ कांग्रेस अध्यक्ष पद के प्रत्याशी अभिषेक चौधरी के समर्थकों ने इस पूरे मामले को सार्वजनिक किया। समर्थकों का आरोप है कि ऑनलाइन वोटिंग के नाम पर बड़े स्तर पर ‘डिजिटल घुसपैठ’ हो रही है। उनका कहना है कि अगर अभी अलर्ट नहीं हुए तो चुनाव की पारदर्शिता सिर्फ दावा बनकर रह जाएगी।
अब सोशल मीडिया पर स्क्रीनशॉट, मैसेज और चर्चाओं की बाढ़ सी आ गई है। संगठन के भीतर भी बेचैनी महसूस की जा रही है। समर्थकों ने लोगों से अपील की है कि जहां भी संदिग्ध वोटिंग दिखाई दे, उसकी तुरंत शिकायत करें।
आखिरी दिन से पहले बढ़ी सियासी धुंध
21 अप्रैल से शुरू हुई यह चुनावी प्रक्रिया अब अपने अंतिम मोड़ पर पहुंच चुकी है। 20 मई को वोटिंग का आखिरी दिन है, लेकिन उससे पहले ही विवादों का ‘डिजिटल तूफान’ खड़ा हो गया है। संगठन के पदाधिकारी साफ कह रहे हैं कि मतदान की तारीख आगे नहीं बढ़ेगी।
लेकिन अब असली चर्चा चुनाव से ज्यादा उस सिस्टम की हो रही है, जिस पर पूरी प्रक्रिया टिकी हुई है।
क्या यह सिर्फ तकनीकी खामी है?
या फिर किसी ने चुनावी ऐप को ही सियासी हथियार बना लिया?
क्या आने वाले दिनों में और भी बड़े नाम सामने आएंगे?
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