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राजस्थान में यहां होलिका दहन की जगह होती है पूजा; जानिए इस गांव की खास परंपरा

राजस्थान में होली का नाम लेते ही आंखों के सामने धधकती लपटें, आसमान छूती आग और उड़ते अंगारों का दृश्य तैर जाता है। लेकिन भीलवाड़ा जिले का हरणी कलां गांव इस परंपरा को एक अलग ही अर्थ देता है। 

Mon, 2 March 2026 02:20 PMSachin Sharma लाइव हिन्दुस्तान
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राजस्थान में यहां होलिका दहन की जगह होती है पूजा; जानिए इस गांव की खास परंपरा

राजस्थान में होली का नाम लेते ही आंखों के सामने धधकती लपटें, आसमान छूती आग और उड़ते अंगारों का दृश्य तैर जाता है। लेकिन भीलवाड़ा जिले का हरणी कलां गांव इस परंपरा को एक अलग ही अर्थ देता है। यहां होलिका दहन नहीं होता—यहां होलिका की पूजा होती है।

जहां बाकी जगह लकड़ियों की चिता सजती है, वहां हरणी कलां में 500 ग्राम चांदी से बनी होलिका और 10 ग्राम सोने से बने भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा श्रद्धा के साथ विराजमान होती है। बिना धुएं, बिना चिंगारी और बिना किसी जोखिम के यहां आस्था का अनोखा उत्सव मनाया जाता है।

जब एक अग्निकांड ने बदली सदीयों की परंपरा

गांव के बुजुर्ग सोहनलाल तेली और घीसालाल जाट बताते हैं कि करीब 65-70 साल पहले तक यहां भी पारंपरिक होलिका दहन होता था। लेकिन एक वर्ष दहन के दौरान उठी चिंगारियां भयंकर आग में बदल गईं। फसलें जल गईं, बाड़े राख हो गए और बेजुबान जानवरों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

उस घटना ने गांव को झकझोर दिया। आपसी विवाद बढ़े और माहौल तनावपूर्ण हो गया। तब गांव के पंच और बड़े-बुजुर्ग चारभुजानाथ मंदिर में जुटे। लंबी चर्चा के बाद सर्वसम्मति से फैसला हुआ—अब होलिका जलाई नहीं जाएगी। आस्था को बचाना है, लेकिन गांव की सुरक्षा उससे भी बड़ी प्राथमिकता है।

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चांदी की होलिका, सोने के प्रह्लाद

फैसले के बाद गांव वालों ने चंदा जुटाया। करीब 500 ग्राम चांदी से होलिका की प्रतिमा और 10 ग्राम शुद्ध सोने से भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा बनवाई गई। तब से यह परंपरा निरंतर निभाई जा रही है।

हर साल होली के दिन इन प्रतिमाओं को मंदिर की तिजोरी से विधिवत निकाला जाता है। पूरा गांव भक्ति के रंग में रंग जाता है।

ऐसे मनती है ‘बिना दहन’ की होली

भव्य शोभायात्रा: चारभुजानाथ मंदिर से बैंड-बाजों और ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकलता है।

चौराहे पर पूजा: जहां आमतौर पर लकड़ियों का ढेर सजता है, वहां ग्रामीण सोने-चांदी की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना करते हैं।

सुरक्षित समापन: पूजा के बाद प्रतिमाओं को वापस मंदिर की तिजोरी में सुरक्षित रख दिया जाता है।

यह पूरा आयोजन अनुशासन और श्रद्धा का अद्भुत संगम है।

‘आस्था को नया और सुरक्षित रूप’

मंदिर के पुजारी गोपाल लाल शर्मा कहते हैं, “हमने परंपरा को छोड़ा नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित स्वरूप दिया है। यहां न आग का खतरा है, न प्रदूषण का डर। हमारी होली भक्ति और जिम्मेदारी दोनों का संदेश देती है।”

दरअसल, जहां देश के कई हिस्सों में हर साल होलिका दहन के दौरान आगजनी की घटनाएं सामने आती हैं, वहीं हरणी कलां ने दशकों पहले ही इसका विकल्प खोज लिया।

पर्यावरण और सुरक्षा की मिसाल

विशेषज्ञों का मानना है कि लकड़ी की खपत और प्रदूषण के लिहाज से भी यह पहल प्रेरणादायक है। बिना धुएं और बिना लकड़ी जलाए होली मनाना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा संदेश है।

गांव के युवा भी इस परंपरा को गर्व से आगे बढ़ा रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गांव की पहचान है।

बदलते दौर में परंपरा का नया रूप

हरणी कलां की कहानी बताती है कि परंपराएं पत्थर की लकीर नहीं होतीं। समय, परिस्थिति और सुरक्षा की जरूरत के अनुसार उन्हें नया स्वरूप दिया जा सकता है।

जहां एक ओर देश भर में होलिका दहन की तैयारियां जोरों पर हैं, वहीं भीलवाड़ा का यह छोटा-सा गांव दुनिया को संदेश दे रहा है—आस्था को निभाने के लिए आग जरूरी नहीं, भावना जरूरी है।

चांदी की होलिका और सोने के प्रह्लाद के साथ यहां हर साल एक ऐसी होली मनती है, जो बिना धुएं के भी उतनी ही उजली और बिना लपटों के भी उतनी ही प्रखर है।

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