1/8आज के दौर की भागदौड़ और बदलती जीवनशैली ने महिलाओं की सेहत के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी कर दी है जिसे 'PCOS' (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) के नाम से जाना जाता है। लेकिन जो समस्या कभी सिर्फ अनियमित पीरियड्स और चेहरे पर अनचाहे बालों तक सीमित समझी जाती थी, वह अब 30 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते गर्भाशय के कैंसर (Endometrial Cancer) जैसा घातक रूप ले रही है। आज दुनियाभर में वर्ल्ड कैंसर डे 2026 मनाया जा रहा है। हर साल 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस (World Cancer Day 2026) मनाने के पीछे का उद्देश्य लोगों को इस जानलेवा रोग के प्रति जागरूक करना होता है।

सीके बिरला हॉस्पिटल की स्त्रीरोग रोग विशेषज्ञ डॉ. परमिंदर कौर कहती हैं कि डॉक्टरों के लिए भी यह चिंता का विषय है कि आखिर क्यों युवा महिलाएं इस साइलेंट खतरे की चपेट में आ रही हैं? हकीकत यह है कि जब शरीर में हार्मोन का संतुलन बिगड़ता है और पीरियड्स महीनों तक थमे रहते हैं, तो गर्भाशय की परत एक खतरनाक बदलाव से गुजरती है। यह महज एक स्त्री रोग नहीं, बल्कि कैंसर की आहट हो सकती है जिसे 'उम्र अभी कम है' कहकर नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है।

आजकल PCOS (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) बहुत कम उम्र की लड़कियों और युवतियों में आम हो गया है। इसे अक्सर सिर्फ पीरियड्स की गड़बड़ी, वजन बढ़ना या स्किन प्रॉब्लम तक सीमित समझ लिया जाता है। लेकिन लंबे समय तक अनदेखा किया गया PCOS गर्भाशय (यूटेरस) के कैंसर का जोखिम बढ़ा सकता है। यही कारण है कि अब 30–35 साल की महिलाओं में भी यूटेराइन कैंसर के मामले बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं।

PCOS में अक्सर हर महीने ओव्यूलेशन नहीं होता, जिसे एनोवुलेटरी साइकिल कहा जाता है। जब ओव्यूलेशन नहीं होता, तो शरीर में प्रोजेस्टेरोन हार्मोन नहीं बनता। इस वजह से एस्ट्रोजन हार्मोन का असर बिना संतुलन के बना रहता है, जिसे अनपोज्ड एस्ट्रोजन कहते हैं। यह एस्ट्रोजन गर्भाशय की अंदरूनी परत (एंडोमेट्रियम) को लगातार मोटा करता रहता है। समय के साथ यह मोटी परत पहले प्री-कैंसर (endometrial hyperplasia) और फिर कैंसर में बदल सकती है।

PCOS सिर्फ हार्मोनल समस्या नहीं है, बल्कि यह मेटाबॉलिक समस्या भी है। इन महिलाओं में मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस, डायबिटीज़ और मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसी समस्याएं भी देखने को मिलती हैं। ये सभी स्थितियां मिलकर यूटेराइन कैंसर के खतरे को और बढ़ा देती हैं। जो लड़कियां किशोरावस्था से PCOS से जूझ रही होती हैं, वे अगर 10–15 साल तक सही लाइफस्टाइल न अपनाएं, तो 30 की उम्र तक गर्भाशय पर इसका असर दिखने लगता है।

2–3 महीने या उससे ज्यादा समय तक पीरियड्स न आना, अनियमित पीरियड्स, असामान्य ब्लीडिंग या स्पॉटिंग, तेजी से वजन बढ़ना, लंबे समय से PCOS का इतिहास। ये सभी संकेत बताते हैं कि गर्भाशय की परत पर लगातार असर पड़ रहा है।

नियमित व्यायाम और संतुलित आहार अपनाएं, वजन और शुगर लेवल नियंत्रित रखें, पीरियड्स लंबे समय तक न आएं तो डॉक्टर से सलाह लें, समय-समय पर अल्ट्रासाउंड और जरूरत हो तो एंडोमेट्रियल जांच करवाएं, PCOS का सही और लगातार इलाज कराएं।

PCOS को हल्के में लेना सही नहीं है। यह समस्या सालों तक शरीर के अंदर असर डालती रहती है और आगे चलकर यूटेराइन कैंसर जैसी गंभीर जटिलता का कारण बन सकती है। सही समय पर पहचान, बेहतर लाइफस्टाइल और नियमित जांच से इस खतरे को काफी हद तक टाला जा सकता है। जागरूकता और समय पर कदम उठाना ही सबसे बड़ा बचाव है।
