1/7बोर्ड परीक्षाओं के दौरान ज्यादातर घरों का माहौल पूरी तरह बदलकर किसी युद्ध स्तर की तैयारी जैसा हो जाता है। माता-पिता अपनी ओर से पूरी कोशिश करते हैं कि बच्चे को हर सुविधा मिले, लेकिन अक्सर 'अच्छी नीयत' के बावजूद वे कई बार उन मनोवैज्ञानिक परतों को नहीं देख पाते जो बच्चा महसूस कर रहा होता है। बातचीत का विषय एक ही होता है, पढ़ाई, सिलेबस, रिविजन और रिजल्ट। माता-पिता की मंशा बुरी नहीं होती, वे बस इतना चाहते हैं कि उनका बच्चा अच्छा करे और आगे चलकर सुरक्षित रहे। लेकिन कई बार जो बातें वे सामान्य या जरूरी समझकर कहते हैं, वही बातें बच्चों के लिए बहुत भारी दबाव बन जाती हैं। यह दबाव अक्सर दिखाई नहीं देता, लेकिन बच्चों के मन पर गहराई से असर करता है। गेटवे ऑफ हीलिंग की संस्थापक और मनोचिकित्सक डॉ. चांदनी तुगनैत से जानते हैं वो कौन सी ऐसी बातें हैं, जो पेरेंट्स बोर्ड एग्जाम प्रेशर के बारे में नहीं समझ पाते हैं।

माता-पिता के लिए बोर्ड एग्जाम एक पड़ाव होता है। बच्चों के लिए यह उनकी पहचान बन जाता है। बच्चे अक्सर यह मान लेते हैं कि वे जैसे नंबर लाएंगे, वही तय करेगा कि वे अच्छे हैं या नहीं। जब यह सोच बन जाती है, तो पढ़ाई सीखने की जगह डर का कारण बन जाती है। माता-पिता को यह एहसास नहीं होता कि बच्चा एग्जाम को नहीं, असफल होने के डर को झेल रहा होता है।

‘तुम्हारा दोस्त कितना पढ़ता है’ जैसी बातें कई घरों में आम हैं। लेकिन माता-पिता यह नहीं समझ पाते कि तुलना बच्चों को मोटिवेट नहीं करती, बल्कि उन्हें खुद पर शक करना सिखाती है। बच्चा अपनी गति और क्षमता को भूलकर दूसरों से खुद को कम आंकने लगता है।

लगातार पूछना कि कितना पढ़ा, कितना याद हुआ, कितना बाकी है, यह सब बच्चों को यह महसूस कराता है कि वे कभी काफी नहीं हैं। माता-पिता को लगता है कि वे ध्यान दिला रहे हैं, लेकिन बच्चे इसे निगरानी की तरह महसूस करते हैं। इससे पढ़ाई बोझ बन जाती है और मन जल्दी थक जाता है।

कई माता-पिता बच्चों के सामने शांत रहने की कोशिश करते हैं, लेकिन अंदर की चिंता उनके हाव-भाव और आवाज से झलक जाती है। बच्चे यह सब महसूस कर लेते हैं। जब वे देखते हैं कि मम्मी-पापा बहुत तनाव में हैं, तो उन्हें लगता है कि एग्जाम बहुत डरावनी चीज है। इससे उनकी एंग्जायटी और बढ़ जाती है।

‘यह एग्जाम बहुत जरूरी है’,’इससे आगे का सब तय होगा’ जैसी बातें बच्चों के दिमाग में यह बैठा देती हैं कि एक गलती सब खत्म कर देगी। माता-पिता को यह नहीं दिखता कि इस सोच से बच्चे का दिमाग फ्रीज हो सकता है। डर में पढ़ी गई चीजें याद रखना मुश्किल हो जाता है।

डॉ. चांदनी तुगनैत कहती हैं कि बोर्ड एग्जाम जरूरी हैं, लेकिन बच्चों की मानसिक शांति उससे ज़्यादा जरूरी है। माता-पिता जो कहते हैं, उसका असर शब्दों से कहीं आगे जाता है। थोड़ा भरोसा, थोड़ी नरमी और यह याद दिलाना कि प्यार रिजल्ट पर निर्भर नहीं करता- यही चीज बच्चों को सबसे ज्यादा मजबूत बनाती है। एग्जाम कुछ दिनों के होते हैं, लेकिन इस समय बच्चों के मन में बैठी बातें बहुत लंबे समय तक साथ रहती हैं।
