'PUC नहीं तो तेल नहीं' वाले आदेश से पंप डीलरों को क्या दिक्कत? समझिए पूरी बात
'दिल्ली पेट्रोल डीलर्स एसोसिएशन' ने सरकार को दिए अपने पत्र में यह साफ किया कि वे प्रदूषण कम करने और लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करने वाले हर कदम के साथ हैं। लेकिन, उनका यह भी तर्क है कि इस नियम को जमीन पर सही तरीके से लागू करना बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण होगा।

दिल्ली में आज से पल्यूशन सर्टिफिकेट वाला कागज न होने पर पेट्रोल-डीजल नहीं दिया जाएगा। पलूशन को देखते हुए दिल्ली सरकार के आदेश से पंप डीलरों को दिक्कत हो रही है। पेट्रोल पंप डीलरों ने बुधवार को दिल्ली सरकार के उस निर्देश को लागू करने में आने वाली कानूनी और तकनीकी चुनौतियों के बारे में बताया है। डीलरों का कहना है कि अगर उनकी मुख्य समस्याओं को सुलझाए बिना और सुरक्षा के इंतजाम किए बिना इसे लागू किया गया, तो पेट्रोल पंपों पर काफी भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे वहां लड़ाई-झगड़े या कानून-व्यवस्था बिगड़ने जैसी नौबत भी आ सकती है।
'दिल्ली पेट्रोल डीलर्स एसोसिएशन' ने सरकार को दिए अपने पत्र में यह साफ किया कि वे प्रदूषण कम करने और लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करने वाले हर कदम के साथ हैं। लेकिन, उनका यह भी तर्क है कि इस नियम को जमीन पर सही तरीके से लागू करना "बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण" होगा।
NCR में एक समान नियम की जरूरत
डीलरों का कहना है कि दिल्ली का प्रदूषण केवल दिल्ली का नहीं है, बल्कि इसका एक बड़ा हिस्सा बाहरी राज्यों और सीमाओं के पार से आता है। उनका तर्क है कि अगर केवल दिल्ली के पेट्रोल पंपों पर BS-VI से पुरानी गाड़ियों को तेल देने से मना किया जाता है, तो इससे प्रदूषण कम करने में खास मदद नहीं मिलेगी। यह नियम तभी असरदार होगा जब इसे पूरे NCR (जैसे नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद) में एक साथ लागू किया जाए।
कानूनी पेंच और सजा का डर
जरूरी वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) में तेल को एक 'आवश्यक वस्तु' माना गया है। इस कानून के तहत अगर कोई पेट्रोल पंप ग्राहक को तेल देने से मना करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। एसोसिएशन का कहना है कि जब तक सरकार इस नियम के लिए कोई स्पष्ट कानून नहीं बनाती या डीलरों को कानूनी सुरक्षा नहीं देती, तब तक तेल देने से मना करना उनके लिए जोखिम भरा है। उन्हें डर है कि तेल न देने पर उन पर केस हो सकता है।
"हम पुलिस नहीं हैं"
एसोसिएशन के अध्यक्ष निश्चल सिंघानिया ने कहा, "पेट्रोल पंप कोई जांच एजेंसी नहीं हैं। नियम लागू करना और लोगों को रोकना उन अधिकारियों का काम है जिनके पास कानूनन शक्तियां हैं। पेट्रोल पंप के कर्मचारियों के पास ऐसे अधिकार नहीं हैं।"
कर्मचारियों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था
एसोसिएशन का कहना है कि ग्राहक पेट्रोल पंप के कर्मचारियों को किसी सरकारी अधिकारी की तरह नहीं देखते। ऐसे में अगर कर्मचारी तेल देने से मना करते हैं, तो बहस, मारपीट और कर्मचारियों के साथ बदसलूकी हो सकती है। इससे पेट्रोल पंपों पर कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा है।
डीलर नहीं हैं अपराधी
डीलरों की एक बड़ी मांग यह है कि यदि कोई पंप 'पीयूसी नहीं, तो तेल नहीं' नियम का पूरी तरह पालन नहीं कर पाता, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। उनका कहना है कि वे सरकार की नीति में केवल मदद कर रहे हैं, उसे जबरन लागू करने वाली एजेंसी नहीं हैं। एसोसिएशन ने कहा, "हम सरकार के इस अभियान को चलाने में सहयोग कर रहे हैं, इसलिए हमें नियमों का उल्लंघन करने वाला नहीं माना जाना चाहिए।"
तकनीकी बाधाएं और पुराना सिस्टम
डीलरों ने तकनीकी समस्याओं की ओर भी इशारा किया:
पुराना सिस्टम: पीयूसी (PUC) चेक करने का मौजूदा सिस्टम पुराना हो चुका है और इसे तुरंत अपडेट करने की जरूरत है।
कमाई में कमी: पिछले 15 सालों में पीयूसी की फीस में बहुत मामूली बढ़ोतरी हुई है। इस वजह से पेट्रोल पंपों के लिए नई और आधुनिक मशीनों में पैसा लगाना घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
डेटा की समस्या: पंपों पर लगे नंबर प्लेट पहचानने वाले कैमरों (ANPR) का कोई लाइव सिस्टम या डैशबोर्ड नहीं है। डेटा सही तरह से न जुड़ने के कारण इस योजना का कभी सफल ट्रायल नहीं हो पाया। पहले की गई कोशिशें भी इसलिए नाकाम रहीं क्योंकि पंपों को गलत या बेकार डेटा मिल रहा था।
एसोसिएशन ने सरकार से आग्रह किया है कि नियम को सुचारू और प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए पहले इन समस्याओं का समाधान किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि जल्दबाजी में इसे लागू करने से न केवल नियम का पालन करना मुश्किल होगा, बल्कि जनता का भरोसा भी कम हो सकता है।




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