मेट्रो के अंदर प्रदूषण कम और ऑटो रिक्शा में ज्यादा क्यों? नई स्टडी ने बता दिया अंतर
शोध में पाया गया कि मेट्रो कोच के अंदर PM2.5 का औसत स्तर 34.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। यह भारत में सुरक्षित मानी जाने वाली सीमा (60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) से काफी कम है। इसके विपरीत, ऑटो-रिक्शा में यात्रा करने वालों पर प्रदूषण का औसत असर 113.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पाया गया।

एक नए अध्ययन के अनुसार, दिल्ली मेट्रो से यात्रा करने वाले लोगों पर प्रदूषण (PM2.5 कणों) का असर सबसे कम होता है, जबकि ऑटो-रिक्शा में सफर करने वाले लोग सबसे अधिक प्रदूषण की चपेट में आते हैं। यह शोध 'वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR)–केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI)' और 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मैनेजमेंट एंड रिसर्च' के शोधकर्ताओं ने किया है।
'डिस्कवर एटमॉस्फियर' जर्नल में प्रकाशित इस रिपोर्ट में दिल्ली मेट्रो की 'मैजेंटा लाइन' के 10.46 किलोमीटर लंबे रास्ते पर पीक ऑवर्स (भीड़भाड़ वाले समय) के दौरान प्रदूषण के स्तर को मापा गया। शोध में पाया गया कि मेट्रो कोच के अंदर PM2.5 का औसत स्तर 34.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। यह भारत में सुरक्षित मानी जाने वाली सीमा (60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) से काफी कम है। इसके विपरीत, ऑटो-रिक्शा में यात्रा करने वालों पर प्रदूषण का औसत असर 113.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पाया गया। यह तय मानक से लगभग दो गुना अधिक है।
अन्य वाहनों में प्रदूषण का स्तर
अध्ययन में अलग-अलग वाहनों के लिए PM2.5 के निम्नलिखित स्तर दर्ज किए गए:
| वाहन का प्रकार | प्रदूषण का स्तर (माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) |
|---|---|
| दोपहिया वाहन (Two-wheelers) | 41.9 |
| बस (खिड़की बंद) | 63.1 |
| बस (खिड़की खुली) | 68.9 |
| कार (खिड़की बंद) | 62.3 |
| कार (खिड़की खुली) | 71.0 |
अध्ययन में यह साफ तौर पर देखा गया कि बंद और एयर-कंडीशन्ड (AC) वाहनों में प्रदूषण का असर काफी कम हो जाता है।
विशेषज्ञों का क्या कहना है?
CRRI की वरिष्ठ वैज्ञानिक एस. पद्मा ने बताया कि दोपहिया वाहनों की तुलना में ऑटो-रिक्शा में PM2.5 की मात्रा अधिक थी। इसका कारण यह है कि दोपहिया वाहनों पर हवा का बहाव बेहतर होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस शोध का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि अलग-अलग वाहनों में यात्रियों को प्रदूषण का कैसा अनुभव होता है। शोध के सह-लेखक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ नीतीश डोगरा ने कहा कि बंद सार्वजनिक परिवहन, विशेष रूप से मेट्रो (खासकर भूमिगत या अंडरग्राउंड स्टेशन), खुली सड़क पर चलने वाले वाहनों की तुलना में बहुत कम प्रदूषित पाए गए।

शोध कैसे किया गया?
यह निगरानी मार्च 2019 में 18 दिनों तक की गई। इसमें PM1, PM2.5, PM10, कार्बन मोनोऑक्साइड और ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषकों को मापा गया। शोधकर्ताओं ने कालकाजी मंदिर और मुनिरका के बीच मैजेंटा लाइन के रास्ते पर वाहनों के भीतर प्रदूषण के स्तर पर ध्यान केंद्रित किया। इस दौरान वाहनों की औसत गति 20–25 किमी प्रति घंटा थी और हर दिन एक ही समय पर रीडिंग ली गई।
वायु गुणवत्ता की जांच के साथ-साथ शोधकर्ताओं ने मेट्रो स्टेशनों और बस स्टॉप पर 317 यात्रियों से बातचीत की और एक सर्वे भरवाया। सर्वे में यह बात सामने आई कि ज्यादातर यात्री यह तो सही पहचानते थे कि मेट्रो परिवहन का सबसे कम प्रदूषण वाला साधन है, लेकिन परिवहन के अन्य साधनों (जैसे बस, कार या ऑटो) के बीच प्रदूषण के अंतर को लेकर उनकी जानकारी काफी सीमित थी।




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