एक टॉपर स्टूडेंट, 18 साल का हैंडसम; हरीश राणा संग हुई थी कौन सी अनहोनी कि संतान के लिए मौत मांगने लगे मां-बाप
जीवन रक्षक उपकरण पूरी तरह बंद किए जाने के आठवें दिन एम्स में हरीश की मौत हो गई। मंगलवार शाम 4:10 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली। यह देश में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला मामला है। उनके माता-पिता की सहमति से एम्स में उनकी दोनों आंख के कॉर्निया व हृदय के वाल्व दान कर दिया गया।

भारत में 'पैसिव यूथेनेशिया' यानी 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' की कानूनी अनुमति पाने वाले पहले व्यक्ति हरीश राणा (31) का मंगलवार को दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले राणा पिछले 13 सालों से 'वेजिटेटिव स्टेट' यानी अचेत अवस्था में थे और जीवन रक्षक प्रणाली पर जिंदा थे, लेकिन उनके स्वास्थ्य में किसी भी तरह का सुधार नहीं हो रहा था, जिसके बाद उनके पिता ने अदालत से उनकी इच्छा मृत्यु की इजाजत मांगी थी। मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उनके जीवन रक्षक उपकरणों को हटाकर और उनका खाना बंद करके उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु दी गई। हरीश को सर्जरी के माध्यम से लगाए गए पीईजी ट्यूबों द्वारा बीते 13 सालों से चिकित्सकीय पोषण दिया जा रहा था, जिसके सहारे वह जीवित थे। हरीश राणा अपने स्कूल के समय पर टॉपर रहे थे, लेकिन एक दुर्घटना ने उनके जीवन की पूरी दिशा बदल दी थी।
हरीश के पिता अशोक राणा ने बताया था कि साल 2013 में उस हादसे के होने से पहले हरीश पंजाब विश्वविद्यालय से बीटेक की पढ़ाई कर रहा था और वहां के टॉपर्स में से एक था। पिता के अनुसार पढ़ाई के अलावा हरीश को जिम जाकर एक्सरसाइज करने और फुटबॉल खेलने का भी बहुत ज्यादा शौक था। परिजनों और दोस्तों का कहना है कि दुर्घटना के समय हरीश की उम्र करीब 18 साल थी और उस वक्त वह बेहद ऐसा हैंडसम और एनर्जेटिक युवक था, जिसकी रुचि पढ़ाई और खेलों में भी समान रूप से थी। राणा के छोटे भाई आशीष भी याद करते हुए कहते हैं कि वह हरीश के साथ बहुत फुटबॉल और वीडियो गेम खेला करते थे।
क्या हुआ था हादसे की उस काली रात को?
हादसे की उस काली रात को याद करते हुए उनके परिजनों ने बताया कि हरीश के साथ यह दुखद हादसा 20 अगस्त 2013 को हुआ था। वह अपने होस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस घटना में ही उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी और वह कोमा में चले गये थे। इसके बाद वे कभी होश में नहीं आ सके थे।
हादसे के तुरंत बाद तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े राणा को स्थानीय अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए कुछ ही घंटों बाद उन्हें चंडीगढ़ के PGIM अस्पताल में शिफ्ट करना पड़ा। इस दौरान यहां उन्हें प्रोटेक्टिव इलाज दिया गया, जिसमें AED (एंटिएपिलेप्टिक दवा), दर्द निवारक दवाएं, वेंटिलेशन सपोर्ट, एंटीबायोटिक्स, ट्रेकियोस्टॉमी और राइल्स ट्यूब (नाक के माध्यम से पोषण) के जरिए खाना देना शामिल था। हालांकि इसके बाद 27 अगस्त 2013 को राणा को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई, लेकिन उनकी सेहत पूरी तरह से ठीक नहीं हुई थी।
अस्पताल से छुट्टी देने के बाद भी नाजुक बनी रही हालत
एक तरफ हरीश को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी, वहीं दूसरी तरफ उनकी स्थिति लगातार नाजुक बनी हुई थी, जिसके कारण उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इस दौरान राजधानी में एम्स के जय प्रकाश नारायण ट्रॉमा सेंटर में उनके सिर की चोट, दौरे, निमोनिया और बेडसोर (बिस्तर पर लगातार लेटने से हुए घावों) के लिए नियमित उपचार कराना पड़ा। लेकिन लगातार 13 साल तक चले इलाज के बाद भी उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। जिसके बाद उनके पिता ने बेटे के तकलीफ भरे जीवन को देखते हुए उनके लिए इच्छामृत्यु की गुहार लगाते हुए अदालत में याचिका लगाई थी।
'दर्द और पीड़ा से मुक्ति मिलना चाहिए'
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था, ‘यदि उपचार प्रभावी साबित नहीं हो रहा है, तो इस तरह का उपचार जारी रखने और हरीश को बेवजह कष्ट देने का कोई तुक नहीं है। परिजनों का मानना है कि हरीश अति कष्ट में है और उसे हर तरह के दर्द और पीड़ा से मुक्ति मिलनी चाहिए।’ मामले में 11 मार्च को सुनाए फैसले के दौरान अदालत ने हरीश राणा को 'निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु' की अनुमति दे दी, साथ ही टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी से प्यार करना केवल खुशियों के समय उसकी परवाह करना नहीं है, बल्कि उसके सबसे दुखद और अंधकारमय क्षणों में भी उसका ख्याल रखना है।
क्या होती है 'निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु'
'निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु' (पैसिव यूथेनेशिया) का अर्थ है किसी मरीज को जीवित रखने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे आवश्यक जीवन रक्षक उपकरण हटा देना या उसे दी जा रहीं दवाएं बंद कर देना, जिसके ठीक होने की कोई संभावना न हो, ताकि उसे प्राकृतिक रूप से मृत्यु प्राप्त हो सके।
आंखों के कार्निया व हार्ट वाल्व दान किया गया
जीवन रक्षक उपकरण पूरी तरह बंद किए जाने के आठवें दिन एम्स में हरीश की मौत हो गई। मंगलवार शाम 4:10 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली। यह देश में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला मामला है। उनके माता-पिता की सहमति से एम्स में उनकी दोनों आंख के कॉर्निया व हृदय के वाल्व दान किया गया गया। ऐसे में हरीश ने भले ही इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनके कॉर्निया ठीक हुआ तो कम से कम दृष्टिबाधित दो लोगों की आंखों को रोशनी मिलेगी। इसलिए उनकी आंखों दुनिया देखती रहेगी।




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