पांच साल से अधिक बचा है नौकरी तो शिक्षकों को 2 साल में पास करना होगा टीईटी, नहीं तो जाएगी नौकरी
प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि शिक्षा के

प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीई) लागू होने से पहले नियुक्त हुए ऐसे शिक्षकों जिनकी नौकरी 5 साल से अधिक बचा है, उन्हें दो साल के भीतर शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करना होगा। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई शिक्षक तय समय सीमा के भीतर टीईटी पास करने में विफल रहते हैं तो उन्हें नौकरी छोड़ना होगा या उन्हें जबरन सेवानिवृ्त किया जा सकता है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और मनमोहन की पीठ ने हालांकि उन शिक्षकों को राहत दी है, जिनकी नौकरी 5 साल से कम बचा है।
पीठ ने फैसला दिया है कि जिन शिक्षकों की नौकरी 5 साल से कम बचा है, उन्हें टीईटी उत्तीर्ण करने की जरूरत नहीं है, लेकिन इस अवधि में उन्हें पदोन्नति नहीं मिलेगी। पीठ ने अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट बनाम महाराष्ट्र सरकार सहित कई अन्य की ओर से दाखिल 87 अपीलों पर यह फैसला सुनाया है। इन अपीलों में कई मुद्दों के अलावा, सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठाया गया था कि क्या 29 जुलाई, 2011 यानी शिक्षा के अधिकार अधिनियम के लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों, जिनके पास वर्षों का अनुभव है, को पदोन्नति के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करना आवश्यक है और क्या अल्पसंख्यक संस्थानों के मामले में, स्कूल शिक्षा विभाग शिक्षकों से टीईटी उत्तीर्ण करने पर जोर दे सकते हैं? राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने 29 जुलाई, 2011 को अधिसूचना में संशोधन के तहत शिक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र व्यक्ति की न्यूनतम योग्यता निर्धारित करते हुए टीईटी को अनिवार्य कर दिया था। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि ‘हम जमीनी हकीकतों के साथ-साथ व्यावहारिक चुनौतियों से भी वाकिफ हैं। पीठ ने कहा कि ऐसे सेवारत शिक्षक हैं जिनकी नियुक्ति आरटीई अधिनियम लागू होने से बहुत पहले हुई थी और जिन्होंने दो या तीन दशकों से भी अधिक समय तक सेवा की है, वे बिना किसी गंभीर शिकायत के अपनी पूरी क्षमता से अपने छात्रों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। फैसले में कहा गया है कि ऐसा नहीं है कि जिन छात्रों को गैर-टीईटी योग्य शिक्षकों ने पढ़ाया है, वे छात्र जीवन में आगे नहीं बढ़ पाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 110 पन्नों के अपने फैसले में कहा है कि ‘ऐसे शिक्षकों को इस आधार पर सेवा से हटाना कि उन्होंने टीईटी उत्तीर्ण नहीं किया है, थोड़ा कठोर प्रतीत होगा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में पूर्ण न्याय प्रदान करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला दिया है। नौकरी 5 साल से कम बचा है तो टीईटी उतीर्ण करने से मिलेगी छूट सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिन शिक्षकों की सेवा आज की तिथि तक 5 साल वर्ष से कम बचा है, उन्हें टीईटी उत्तीर्ण किए बगैर सेवानिवृति की आयु प्राप्त करने तक सेवा में बने रहने की अनुमति हैं। लेकिन उन्हें पदोन्नति नहीं मिलेगी। यदि पदोन्नति की आकांक्षा रखता है, तो उन्हें भी टीईटी उत्तीर्ण करना होगा। 5 साल से अधिक है नौकरी तो 2 साल में उत्तीर्ण करना होगा टीईटी, नहीं तो जाएगी नौकरी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरटीई अधिनियम के लागू होने से पहले नियुक्त किए गए शिक्षकों, जिनकी नौकरी अभी 5 साल से अधिक बचा है, उन्हें सेवा में बने रहने के लिए 2 साल के भीतर टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा। यदि ऐसे शिक्षकों में से कोई भी तय समय के भीतर टीईटी उत्तीर्ण करने में विफल रहता है, तो उन्हें नौकरी छोड़नी होगी या उन्हें अनिवार्य रूप से सेवानिवृत किया जा सकता है। मिलेगा सेवानिवृति का लाभ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि तय गए समय सीमा में शिक्षक शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करने में विफल रहते हैं तो उन्हें नौकरी छोड़नी होगी, हालांकि वे सेवानिवृति का सभी लाभ उन्हें मिलेगा। शीर्ष अदालत ने इसमें एक शर्त जोड़ा है कि अंतिम लाभों के लिए अर्हता प्राप्त करने के लिए, ऐसे शिक्षकों को नियमों के अनुसार, अर्हक सेवा अवधि पूरी करनी होगी। यदि किसी शिक्षक ने अर्हक सेवा पूरी नहीं की है और उसमें कोई कमी है, तो उसके मामले पर सरकार के उपयुक्त विभाग द्वारा उसके द्वारा प्रतिवेदन दिए जाने पर विचार किया जा सकता है। अल्पसंख्यक संस्थानों को आरटीई के दायरे पर बाहर रखने के फैसले पर हो पुनर्विचार- सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में 5 जजों की संविधान पीठ द्वारा ‘प्रमाटी एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट मामले में पारित उस फैसले पर सवाल उठाया है, जिसमें कहा गया था कि बच्चों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 अल्पसंख्यक स्कूलों, चाहे वे सहायता प्राप्त हों या गैर-सहायता प्राप्त, पर लागू नहीं होता है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और मनमोहन की पीठ ने कहा कि ‘मौजूदा मामले में विस्तृत चर्चा के मद्देनजर, हम सम्मानपूर्वक अपनी शंका व्यक्त करते हैं कि क्या प्रमाटी मामले में, जहां तक यह खंड 1 के अंतर्गत आने वाले अल्पसंख्यक स्कूलों, चाहे वे सहायता प्राप्त हों या गैर-सहायता प्राप्त, पर आरटीई अधिनियम के लागू होने से छूट देता है, सही ढंग से निर्णय लिया गया है? इसके साथ ही, पीठ ने इस मामले में देश के प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई के समक्ष भेज दिया और उनके इन मुद्दों की पड़ताल के लिए बड़ी पीठ यानी 7 जजों की संविधान पीठ गठित करने का आग्रह किया है। पीठ ने कहा कि हमारी राय में 5 जजों की संविधान पीठ द्वारा अल्पसंख्यक स्कूलों को शिक्षा के अधिकार कानून के दायरे से पूरी तरह से बाहर करने में कुछ भूल हुई है।
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