दिल्ली हिंसा: कथित साजिश के मास्टरमाइंड थे उमर खालिद और शरजील इमाम: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हिंसा मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को मुख्य साजिशकर्ता माना है। कोर्ट ने कहा कि इनकी भूमिका केंद्रीय थी और ये दिशा-निर्देश देने में शामिल थे। अन्य सह-आरोपियों की भूमिका सहायक थी। जमानत पर भी कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और कहा कि आरोप 'आतंकवादी कृत्य' की परिभाषा के अंतर्गत आ सकते हैं।

इनकी भूमिका छोटी नहीं, मुख्य भूमिका थी, निर्देश देनेवाले भूमिका में थे बाकी आरोपी निर्देश माननेवाले प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हिंसा मामले में कहा है कि इमाम और खालिद हिंसा की बड़ी साजिश के लिए कथित मास्टरमाइंड हैं और इस संबंध में अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूत सीधे, पुष्टि करने वाले और समकालीन हैं। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने 141 पन्नों के फैसले में स्पष्ट किया कि आरोपियों की भूमिका छिटपुट या स्थानीय नहीं, बल्कि केंद्रीय और मुख्य थी। दोनों दिल्ली हिंसा की साजिश, लामबंदी करने और रणनीतिक दिशा-निर्देश देने में शामिल थे।
फैसले में कहा गया है कि जांच एजेंसी की ओर से पेश साक्ष्य खालिद और इमाम हिंसा के लिए कथित बड़ी साजिश रचने, योजना बनाने और अंजाम देने के लिए समन्वय स्थापित करने में ‘केंद्रीय और निर्देश देने वाली भूमिका’ का संकेत देते हैं, जबकि सह-आरोपी गुलफिशा, मीरान हैदर और अन्य की भूमिकाएं सिर्फ सहायक या मददगार वाली थीं। पीठ ने यूएपीए की धारा 43डी (5) का हवाला देते हुए कहा है कि यदि किसी मामले की डायरी या आरोपपत्र की जांच करने पर न्यायालय को यह विश्वास करने के लिए उचित आधार मिलते हैं कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही है, तो न्यायालय को जमानत देने से इनकार करना होगा। पीठ ने कहा है कि जहां तक मौजूदा मामले का सवाल है तो इस स्तर पर अपेक्षित एवं अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री से प्रथम दृष्टया साजिश में उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका का प्रमाण मिलता है। फैसले में कहा गया है कि यूएपीए के प्रावधान के अनुसार, यदि मामले की डायरी या संहिता की धारा 173 के तहत बनाई गई रिपोर्ट का अवलोकन करने पर न्यायालय की यह राय हो कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सत्य है, तो ऐसे आरोपी व्यक्ति को जमानत पर या स्वयं के निजी मुचलके पर रिहा नहीं किया जाएगा। जमानत देता नियमित प्रक्रिया नहीं सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि यद्यपि आतंकवाद निरोधक कानून यानी यूएपीए मामलों में जमानत देना नियमित प्रक्रिया नहीं है, फिर भी कानून के तहत जमानत देने से इनकार करना अनिवार्य नहीं है और यह कानून जमानत देने के न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को भी सीमित नहीं करता। खालिद और इमाम की भूमिका: दिशा-निर्देश देने की भूमिका में थे सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम ने अपने करीबी लोगों के अंदर या बाहर व्यक्तियों को जुटाने या प्रभावित करने के लिए कमांड और अथॉरिटी का इस्तेमाल किया। कमांड की एक वर्टिकल चेन थी जिसमें कथित तौर पर साजिश के लेवल के फैसले और रणनीतिक निर्देश उनसे ही आते थे। शुरुआत में, उमर खालिद और शरजील इमाम को पहली नजर में केंद्रीय भूमिका सौंपी गई। उनके खिलाफ जिन सबूतों पर भरोसा किया गया है, वे मुख्य रूप से भाषणों, बैठकों, डिजिटल संचार और कथित रणनीतिक विचार-विमर्श के रूप में हैं, जो नागरिकता संशोधन विधेयक और नागरिकता संशोधन कानून पारित होने के तुरंत बाद शुरू हुए। आरोपपत्र में उन्हें विरोध की रणनीति बनाने की भूमिका बताई गई है, जिसमें कथित तौर पर धरने से चक्का जाम में बदलाव, जगहों का चुनाव, और आगे बढ़ाए जाने वाले व्यापक राजनीतिक उद्देश्य को स्पष्ट करना शामिल है। इस प्रकार उनके कथित कार्य योजना और तैयारी के चरण लंबी अवधि तक चले। उमर खालिद और शरजील इमाम के विपरीत मामले के सह-आरोपी गुलफिशा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान और अन्य के पास संसाधन जुटाने या संगठनात्मक प्रभाव डालने की कोई स्वतंत्र क्षमता नहीं थी, इसलिए, वे वैसा ही व्यवस्थागत खतरा पैदा नहीं करते हैं। उनकी कथित संलिप्तता साइट-विशिष्ट और ऑपरेशनल है, जो सीलमपुर, जाफराबाद, चांद बाग, जामिया और शाहीन बाग जैसे खास इलाकों तक सीमित है। उनके खिलाफ आरोप मुख्य रूप से जमीनी स्तर पर लोगों को जुटाने, लॉजिस्टिकल समन्वय, स्थानीय स्तर पर फंडिंग, सामग्री का स्टॉक जमा करने और कथित तौर पर ऊपर से मिले निर्देशों को लागू करने से संबंधित हैं, न कि बड़ी रणनीति बनाने से। अदालत यह तय नहीं कर सकता कि आरोप ‘आतंकवादी कृत्य’ की शर्तों को पूरा करता है या नहीं: सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि जमानत के मुद्दे पर अदालत यह तय नहीं कर सकता कि आरोप ‘आतंकवादी कृत्य’ की शर्तों को पूरा करता है या नहीं। हालांकि शीर्ष कोर्ट ने अंतिम फैसले पर विचार नहीं किया, लेकिन यह मानना है कि जांच इस बात की होनी चाहिए कि क्या कथित कृत्य, कम से कम पहली नजर में, राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरों की कानूनी परिभाषा के दायरे में आते हैं? शरजील इमाम पर लगाए गए भाषणों और उमर खालिद के भाषण, जिसमें चक्का जाम और धरने के बीच अंतर बताया गया था, पहली नजर में धारा 15 के तहत राज्य की सुरक्षा के लिए खतरे की कानूनी परिभाषा के दायरे में आते हैं। सार्वजनिक सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए मुख्य साजिशकर्ता की हिरासत जरूरी सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में सार्वजनिक व व्यापक सुरक्षा हितों की रक्षा और भविष्य के कृत्य को रोकने के लिए कथित मुख्य साजिशकर्ता की निरंतर हिरासत को जरूरी बताया। पीठ ने कहा कि ऐसे में, अनुच्छेद 21 को व्यक्तिगत परिस्थितियों पर विचार किए बिना सभी आरोपी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता है। दिल्ली पुलिस की दलीलें दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य लोगों ने शांतिपूर्ण विरोध की आड़ में सत्ता परिवर्तन अभियान चलाकर देश की संप्रभुता और अखंडता पर हमला करने की साजिश रची थी। पुलिस ने कहा था कि उसने आरोपियों के खिलाफ प्रत्यक्ष, दस्तावेजी और तकनीकी साक्ष्य एकत्र किए हैं जो सांप्रदायिक आधार पर राष्ट्रव्यापी दंगों को भड़काने में उनकी अंतर्निहित, गहरी और प्रबल संलिप्तता को दर्शाते हैं। शीर्ष अदालत ने पिछले साल 10 दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। फरवरी, 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।
लेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




साइन इन