neelkanth varni whose statue placed in delhi akshardham temple दिल्ली के अक्षरधाम में जिन नीलकंठ वर्णी की लगी मूर्ति वह 11 की उम्र में 12000KM की पैदल यात्रा पर निकले , कहलाए भगवान, Ncr Hindi News - Hindustan
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दिल्ली के अक्षरधाम में जिन नीलकंठ वर्णी की लगी मूर्ति वह 11 की उम्र में 12000KM की पैदल यात्रा पर निकले , कहलाए भगवान

दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में स्थापित की गई 108  फीट ऊंची प्रतिमा। भगवान स्वामीनारायण जब किशोरावस्था में नीलकंठ वर्णी कहलाए,उनके उस स्वरूप को दर्शाती यह प्रतिमा एक पैर पर खड़ी विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति है।

Fri, 27 March 2026 01:45 PMSudhir Jha लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दिल्ली के अक्षरधाम में जिन नीलकंठ वर्णी की लगी मूर्ति वह 11 की उम्र में 12000KM की पैदल यात्रा पर निकले , कहलाए भगवान

दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में जाने वाले श्रद्धालु और पर्यटक इसकी सुंदरता और कलाकृतियों को देखकर चकित रह जाते हैं। अब यहां 108 फीट ऊंची एक प्रतिमा ने यमुना किनारे बसे इस पवित्र स्थल को और ज्यादा आकर्षक बना दिया है। भगवान स्वामीनारायण जब किशोरावस्था में नीलकंठ वर्णी कहलाए,उनके उस स्वरूप को दर्शाती यह प्रतिमा एक पैर पर खड़ी विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति है। 26 मार्च को विधि विधान से मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई।

भगवान स्वामी नारायण का जन्म 3 अप्रैल 1781 को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले की छपिया गांव में हुआ था। माता-पिता ने उनका नाम घनश्याम पांडे रखा था। कहा जाता है कि जब घनश्याम महज 3 वर्ष के थे तो मार्कंडेय मुनि उनके माता-पिता के पास आए और भविष्यवाणी की कि यह बालक एक धर्म की स्थापना करेगा और लोगों की जिंदगी से दर्द और दुख को हटाते हुए उन्हें भगवान की प्राप्ति का मार्ग दिखाएगा।

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11 साल की उम्र में ही छोड़ा घर

घनश्याम जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता धर्मदेव और भक्तिमाता का निधन हो गया था। महज 11 साल की उम्र में ही घनश्याम ने घर छोड़ दिया और वह आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़े। लगातार 7 साल तक पैदल चलते हुए उन्होंने 12000 किलोमीटर की यात्रा की। उनकी यह यात्रा हिंदू सनातन धर्म के आदर्शों को पुनर्स्थापित करने पर केंद्रित थी। इस दौरान वे नीलकंठ वर्णी के नाम से जाने जाते थे।

हिमालय की चोटियों से दक्षिण के समुद्र तक

एक युवा योगी नीलकंठ वर्णी जहां पैदल हिमालय की चोटियों तक पहुंचे तो असम के जंगल और दक्षिण के समुद्री किनारों तक पैदल गए। हिमालय पर उन्होंने महीनों तपस्या की और ऐसे मौसम में वहां रहे जब लोग भीषण ठंड से बचने के लिए तमाम उपाय करते थे। अपने घर से केवल एक धोती, एक धर्मग्रंथ, एक मूर्ति और एक भिक्षापात्र लेकर निकले नीलकंठ वर्णी ने लोगों को ईश्वर के करीब लाने के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उनकी तपस्या और साहस ने उन असंख्य लोगों को बहुत प्रभावित किया जो उनके संपर्क में आए।

जब गुजरात पहुंचे और गुरु से मिला नया नाम

नीलकंठ ने भारत में एक ऐसे दौर में यात्रा की जब समाज में अंधविश्वास और काले जादू का प्रभाव बढ़ गया था। अपनी यात्राओं के माध्यम से नीलकंठ ने हिंदू धर्म की आस्था, भक्ति और नियम की अवधारणाओं को पुनर्जीवित किया। बाद में गुजरात में उनकी मुलाकात गुरु रामानंद स्वामी से हुई। जिन्होंने नीलकंठ वर्णी को मनुष्य के शरीर में भगवान बताया और उन्हें नारायण मुनि और सहजनंद स्वामी का नाम दिया।

1802 में पहली बार स्वामीनारायण मंत्र

1802 में रामानंद स्वामी ने उन्हें उद्धव संप्रदाय का नेतृत्व सौंपा। गुरु के निधन के बाद सहजनंद स्वामी ने एक सभा आयोजित की और अपने अनुयायियों को स्वामीनारायण मंत्र पढ़ाया। इसके बाद वह स्वामीनारायण के रूप में प्रसिद्ध हुए। आज स्वामीनारायण संप्रदाय के लाखों अनुयायी दुनियभर में फैले हैं।

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