दिल्ली मेट्रो में विदेशी महिला से अश्लील हरकत, स्टेशन पर पेशाब.. इन 'जाहिलों' का इलाज कब?
Opinion: दिल्ली मेट्रो में प्लेटफॉर्म पर पेशाब और अमेरिकी महिला से छेड़छाड़ की घटनाओं ने राजधानी को शर्मसार कर दिया है। विश्व स्तरीय सुविधाओं के बावजूद लोगों के गिरते सिविक सेंस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

देश की राजधानी दिल्ली को 'दिलवालों का शहर' कहते हैं। यहां के चमक-दमक पर दिल्लीवाले इतराते हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों में दो ऐसी घटनाएं घटीं जिन्होंने हमारी सभ्यता की पोल खोल दी। एक तरफ मेट्रो प्लेटफॉर्म पर खुलेआम पेशाब करने का वीडियो वायरल हुआ, वहीं दूसरी तरफ एक अमेरिकी महिला से छेड़छाड़ का मामला आया। एक तरफ हम 'विश्वगुरु' बनने की बात करते हैं और दूसरी तरफ हमारे शहर के पब्लिक ट्रांसपोर्ट और सड़कों पर 'जाहिलियत' का नंगा नाच हो रहा है। सवाल यही है कि ऐसे लोगों को कब सबक सिखाया जाएगा।
मेट्रो स्टेशन पर 'खुलेआम पेशाब'
सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक युवक दिल्ली मेट्रो के प्लेटफॉर्म पर ग्लास रेलिंग के पास खड़े-खड़े पेशाब करता दिख रहा है। जैसे ही उसे पता चला कि कैमरा रिकॉर्ड कर रहा है, वो बीच में ही रुककर भाग निकला। यह वीडियो सिर्फ गंदगी का नहीं, बल्कि हमारे 'सिविक सेंस' की मौत का सबूत है। दिल्ली मेट्रो, जिसे हम वर्ल्ड क्लास कहते हैं, वहां ऐसी हरकत करने की हिम्मत किसी में कैसे आई? क्या 200-500 रुपये का मामूली जुर्माना इन लोगों के लिए काफी है?
'अतिथि देवो भव' या 'अतिथि से बदसलूकी'?
अभी गंदगी की स्याही सूखी भी नहीं थी कि एक अमेरिकी महिला ने दिल्ली मेट्रो पर अपनी आपबीती शेयर की, जो रोंगटे खड़े कर देती है। महिला का दावा है कि एक 14-15 साल का लड़का अपनी मां और बहन के साथ फोटो लेने के बहाने उसके कंधे पर हाथ रखा, फिर सीधे उसके ब्रेस्ट्स को टच किया और हंसते हुए भाग गया। सबसे शर्मनाक बात यह है लड़के की मां और बहन ने उसे डिफेंड करते हुए कहा कि वो 'क्यूरियस' था और 'ओवररिएक्ट' न करें। महिला, जो दोस्त की शादी में आई थी, अब कह रही है कि वो कभी भारत नहीं लौटेगी। हम 'अतिथि देवो भव' का नारा देते हैं, लेकिन हकीकत में विदेशी पर्यटक दिल्ली की मेट्रो में खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। क्या ये सिर्फ एक परिवार की गलती है, या पूरे समाज की ट्रेनिंग में खामी?

सिस्टम टॉप क्लास, लेकिन लोग बॉटम लेवल?
ये दोनों घटनाएं एक साथ देखें तो साफ पता चलता है कि सरकार ने हमें विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर दिया। लेकिन कई लोगों की सोच अभी भी पिछड़ी हुई है। पेशाब करने वाला जानता था कि कोई रोकेगा नहीं, क्योंकि सिविक सेंस हमारे डीएनए में नहीं। छेड़छाड़ करने वाला जानता था कि भीड़ में बच निकलेगा, क्योंकि महिलाओं की सुरक्षा पर हमारी पुलिस और समाज दोनों लापरवाह हैं। सोशल मीडिया पर आक्रोश है, लेकिन क्या इससे कुछ बदलेगा? पिछले साल भी एक पिता ने बच्चे को ट्रैक्स पर पेशाब करवाया था, लेकिन कोई सबक नहीं लिया गया।
हरकत गंदी, जुर्माना मामूली
इन घटनाओं के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर लोगों में कानून का डर क्यों नहीं है? जवाब दिल्ली मेट्रो रेलवे (O&M) एक्ट, 2002 के प्रावधानों में छिपा है। सजा इतनी मामूली है कि अपराधी इसे 'जेब खर्च' समझकर चुका देते हैं।
अगर कोई मेट्रो परिसर में थूकता है या गंदगी फैलाता है, तो उस पर सिर्फ 200 रुपये का जुर्माना है। जी हां, सिर्फ 200 रुपये। इसके अलावा उसे मेट्रो से बाहर निकाला जा सकता है। वहीं मेट्रो ट्रैक पर जाने पर 500 रुपये का जुर्माना या 6 महीने की जेल (या दोनों) हो सकती है। लेकिन जेल की सजा बहुत दुर्लभ मामलों में होती है। मेट्रो एक्ट में 'नशे में धुत होकर उपद्रव' करने पर धारा 59 लगती है, लेकिन छेड़छाड़ के मामले में BNS (भारतीय न्याय संहिता) की गंभीर धाराएं पुलिस द्वारा लगाई जाती हैं, न कि सिर्फ मेट्रो एक्ट।
अब इलाज का वक्त
हकीकत यह है कि जब पेशाब करने या थूकने जैसी हरकत पर जुर्माना पिज्जा या मूवी टिकट से भी सस्ता होगा, तो 'जाहिलों' के मन में डर कैसे पैदा होगा? अब वक्त आ गया है कि इन 20-साल पुराने कानूनों में संशोधन किया जाए और जुर्माने की राशि बढ़ाकर कम से कम 5,000 से 10,000 रुपये की जाए, साथ ही 'पब्लिक शेमिंग' (सार्वजनिक निंदा) का प्रावधान भी हो। इसके अलावा अब DMRC को 'नो एंट्री लिस्ट' बनानी चाहिए, जैसे एयरलाइंस में होती है। पुलिस को छेड़छाड़ पर जीरो टॉलरेंस पॉलिसी अपनानी होगी, खासकर विदेशी पर्यटकों के मामले में। सिर्फ वीडियो वायरल करने से काम नहीं चलेगा। समाज को खुद से सवाल पूछना होगा कि हम कब सभ्य बनेंगे? दिल्ली को 'दुनिया की नजरों में' चमकाने के लिए, पहले अपनी मानसिक गंदगी साफ करनी पड़ेगी, वरना ये बदनामी की तस्वीरें आती रहेंगी।




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