लाहौर से दिल्ली तक… कैसे बना दिल्ली हाई कोर्ट? 1966 की वो कहानी जो कम लोग जानते हैं
इतिहास के पन्नों को पीछे पलटें तो मालूम चलता है कि ये यात्रा लाहौर से शुरू होकर शिमला, चंडीगढ़ होते हुए आखिरकार दिल्ली तक पहुंची है। नो योर दिल्ली सीरीज के इस लेख में जानिए दिल्ली हाईकोर्ट के बनने की कहानी।

क्या आप जानते हैं कि दिल्ली का अपना हाई कोर्ट 1966 से पहले नहीं था? आज जिस शहर को देश का न्याय और सत्ता का सेंट्रल प्वाइंट माना जाता है, वहां के लोगों को कभी अपने ही शहर में हाई कोर्ट की सुविधा नहीं मिलती थी। इतिहास के पन्नों को पीछे पलटें तो मालूम चलता है कि ये यात्रा लाहौर से शुरू होकर शिमला, चंडीगढ़ होते हुए आखिरकार दिल्ली तक पहुंची है। "नो योर दिल्ली" सीरीज के इस लेख में जानिए दिल्ली हाईकोर्ट के बनने की कहानी।
लाहौर से शिमला पहुंचने की कहानी
दरअसल, ब्रिटिश दौर में 1919 में स्थापित लाहौर हाई कोर्ट पंजाब और दिल्ली दोनों पर अधिकार रखता था। इस तरह दिल्ली की न्यायिक जिम्मेदारी लाहौर हाई कोर्ट के अंतर्गत आती थी। 1947 में देश के बंटवारे के बाद हालात बदल गए। भारत और पाकिस्तान बनने के साथ ही लाहौर पाकिस्तान में चला गया, और भारत को अपने हिस्से के लिए नई न्यायिक व्यवस्था खड़ी करनी पड़ी। इसी के तहत ‘ईस्ट पंजाब हाई कोर्ट’ का गठन हुआ, जिसने दिल्ली के मामलों को भी संभालना शुरू किया।
शिमला से चंडीगढ़ शिफ्ट हुआ हाईकोर्ट
इस नए हाई कोर्ट ने शिमला के एक मशहूर भवन ‘पीटरहॉफ’ से काम शुरू किया। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था-1981 में यह इमारत आग की भेंट चढ़ गई। हालांकि उससे पहले ही 1950 के दशक में पंजाब सरकार का सचिवालय चंडीगढ़ शिफ्ट हो चुका था और हाई कोर्ट भी वहीं चला गया। इसके बाद दिल्ली के मामलों के लिए एक ‘सर्किट बेंच’ बनाई गई, जहां राजधानी से जुड़े केस सुने जाते थे।


1966 में हुई दिल्ली हाई कोर्ट की स्थापना
लेकिन समय के साथ दिल्ली की आबादी, राजनीतिक महत्व और मामलों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। यह साफ हो गया कि अब दिल्ली को अपना अलग हाई कोर्ट चाहिए। आखिरकार संसद ने 1966 में ‘दिल्ली हाई कोर्ट एक्ट’ पास किया और 31 अक्टूबर 1966 को दिल्ली हाई कोर्ट की स्थापना हुई।
शुरूआत में हिमाचल की भी होती थी सुनवाई
शुरुआत में इस हाई कोर्ट में सिर्फ चार जज थे, मुख्य न्यायाधीश के.एस. हेगड़े, जस्टिस आई.डी. दुआ, जस्टिस एच.आर. खन्ना और जस्टिस एस.के. कपूर। दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती दौर में इस हाई कोर्ट का अधिकार क्षेत्र सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं था, बल्कि हिमाचल प्रदेश भी इसके दायरे में आता था। शिमला में ‘रेवेन्सवुड’ नामक इमारत में इसकी बेंच भी चलती थी। 1971 में हिमाचल प्रदेश के अलग राज्य बनने के बाद यह व्यवस्था खत्म हुई।


जानिए आज का दिल्ली हाईकोर्ट
आज दिल्ली हाई कोर्ट देश के सबसे व्यस्त और प्रभावशाली उच्च न्यायालयों में गिना जाता है। समय के साथ यहां जजों की संख्या बढ़कर 45 स्थायी और 15 अतिरिक्त जजों तक पहुंच चुकी है। दिल्ली की न्यायिक व्यवस्था सिर्फ हाई कोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके नीचे जिला अदालतों का एक बड़ा नेटवर्क काम करता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में कुल सात डिस्ट्रिक्ट कोर्ट कॉम्प्लेक्स हैं, जो दिल्ली हाई कोर्ट के अधीन कार्य करते हैं।
दिल्ली की निचली अदालतों का ढांचा
ये सात कॉम्प्लेक्स भले ही भौतिक तौर पर अदालतों के केंद्र हैं, लेकिन वास्तव में यहां 11 जिला अदालतें चलती हैं। इनकी अध्यक्षता अलग-अलग जिला जज करते हैं। तीस हजारी, रोहिणी और साकेत कॉम्प्लेक्स में दो-दो जिले चलते हैं। कड़कड़डूमा कॉम्प्लेक्स में तीन जिलों की अदालतें हैं। इसके अलावा पटियाला हाउस, द्वारका और राउज एवेन्यू कॉम्प्लेक्स में एक-एक जिला अदालत संचालित होती है। यह पूरा ढांचा दिल्ली की विशाल आबादी और बढ़ते मामलों को संभालने में अहम भूमिका निभाता है।
- लेख में इस्तेमाल की गई तस्वीरें दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जारी किए गए दस्तावेज से ली गई हैं। इसका नाम है- "Delhi High Court celebrating 50 years"





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