Delhi High Court forcing woman to continue pregnancy violates mental trauma कलह की स्थिति में गर्भ रखने को मजबूर नहीं कर सकते, HC ने क्रिमिनल केस से पत्नी को बरी किया, Ncr Hindi News - Hindustan
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कलह की स्थिति में गर्भ रखने को मजबूर नहीं कर सकते, HC ने क्रिमिनल केस से पत्नी को बरी किया

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक कलह की स्थिति में किसी महिला को गर्भ रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। कोर्ट ने इसे महिला की शारीरिक गरिमा का उल्लंघन और मानसिक आघात को बढ़ाने वाला बताया। कोर्ट ने पति द्वारा दायर आपराधिक मामले से महिला को बरी कर दिया।

Thu, 8 Jan 2026 06:30 PMSubodh Kumar Mishra पीटीआई, नई दिल्ली
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कलह की स्थिति में गर्भ रखने को मजबूर नहीं कर सकते, HC ने क्रिमिनल केस से पत्नी को बरी किया

सेशन कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक कलह की स्थिति में किसी महिला को गर्भ रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। कोर्ट ने इसे महिला की शारीरिक गरिमा का उल्लंघन और मानसिक आघात को बढ़ाने वाला बताया। कोर्ट ने पति द्वारा दायर आपराधिक मामले से महिला को बरी कर दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि वैवाहिक कलह की स्थिति में एक महिला को गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक गरिमा से उल्लंघन और मानसिक आघात को बढ़ाने वाला है। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने महिला के स्वायत्त अधिकार पर जोर देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता पत्नी को आईपीसी की धारा 312 (गर्भपात कराना) के तहत अपराध का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

प्रजनन पर नियंत्रण महिलाओं की मूलभूत जरूरत और अधिकार

जस्टिस कृष्णा ने कहा कि प्रजनन पर नियंत्रण सभी महिलाओं की मूलभूत जरूरत और अधिकार है। उन्होंने 14 सप्ताह के गर्भ को मेडिकल तरीके से खत्म करने के मामले में पति द्वारा दायर आपराधिक मामले में अलग रह रही पत्नी को बरी करते हुए यह बात कही। कोर्ट ने कहा कि चिकित्सा गर्भपात अधिनियम के तहत गर्भवती महिला को गर्भपात के लिए पति की अनुमति लेना अनिवार्य नहीं है। इस अधिनियम का मूल उद्देश्य महिला के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान से रोकना है।

6 जनवरी को दिए गए अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि यदि कोई महिला गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती है तो उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करना उसके शारीरिक अधिकारों का उल्लंघन है। ऐसा करना उसके मानसिक आघात को और बढ़ा देता है जो उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में वैवाहिक कलह की स्थिति में महिला के गर्भपात कराने के अधिकार को मान्यता दी है। एमटीपी अधिनियम की धारा 3 और उसमें किए गए नियमों के उल्लेख से यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता ने आईपीसी की धारा 312 के तहत कोई अपराध किया है।

याचिकाकर्ता (पत्नी) के तर्क

याचिकाकर्ता ने सेशन कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें आईपीसी की धारा 312 के तहत अपराध के लिए मजिस्ट्रेट कोर्ट के समक्ष उसे तलब करने का आदेश बरकरार रखा गया था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त उसकी प्रजनन स्वायत्तता को अपराधीकरण किया गया है। उसकी निजता, शारीरिक अखंडता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार अनदेखी की गई है।

पति का तर्क

पति ने तर्क दिया कि चूंकि गर्भपात की तारीख को दंपति साथ रह रहे थे। उनके बीच कोई वैवाहिक कलह नहीं थी, इसलिए एमटीपी अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होंगे। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि वैवाहिक कलह को इस तरह से नहीं परिभाषित किया जा सकता कि यह केवल पक्षों के अलग होने और मुकदमेबाजी में जाने के बाद ही मौजूद हो।

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पहले से ही वैवाहिक तनाव महसूस कर रही थी

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पत्नी द्वारा अपने ओपीडी कार्ड में दिए गए कारण से पता चलता है कि वह पहले से ही वैवाहिक तनाव महसूस कर रही थी। उसने अपने पति से अलग होने का निर्णय ले लिया था। कोर्ट ने कहा कि दुख सिर्फ महिला को ही भुगतना पड़ता है। ऐसी गर्भावस्था अपने साथ अथाह कठिनाइयां लेकर आती है, जिससे गंभीर मानसिक आघात पहुंचता है। गर्भावस्था से सामाजिक, आर्थिक और अन्य पहलू तुरंत जुड़ जाते हैं। अगर गर्भावस्था अनचाही हो तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह निस्संदेह मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

कोर्ट ने आगे कहा कि एमटीपी नियम 3-बी(सी) के तहत वैवाहिक स्थिति में बदलाव होने पर (जैसे विधवापन या तलाक होने पर) महिला मेडिकल रूप से गर्भपात कराने की पात्र होती है। इस नियम द्वारा दिया गया लाभ उन सभी महिलाओं पर लागू होता है जिनकी भौतिक परिस्थितियों में बदलाव होता है।

ऐसी गर्भावस्था असहनीय कठिनाइयां लाती हैं

कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक कलह का सामना कर रही महिला के मानसिक आघात को ध्यान में रखते हुए इस कठोर वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जो गर्भावस्था होने पर कई गुना बढ़ जाता है। न केवल उसे अपना भरण-पोषण स्वयं ही करना पड़ता है, बल्कि उसे अकेले ही बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। उसे किसी भी स्रोत से कोई सहायता नहीं मिलती। केवल महिला ही पीड़ित होती है। ऐसी गर्भावस्था अपने साथ असहनीय परेशानियां लाती हैं, जिससे गंभीर मानसिक आघात पहुंचता है।

अदालत ने यह भी कहा कि महिला तनावग्रस्त थी और उसे वैवाहिक कलह का अनुभव हो रहा था। इससे ऐसी स्थिति पैदा हुई जिसमें तनाव का उसके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। इसलिए वह गर्भपात कराने के लिए सक्षम थी।

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