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सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज, HC ने कहा- समीक्षा का दायरा सीमित

दिल्ली हाई कोर्ट ने सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा 2023, विशेष रूप से पेपर-2 (सीसैट) को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं के मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा अत्यंत सीमित होता है।

Thu, 5 Feb 2026 02:39 PMSubodh Kumar Mishra लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज, HC ने कहा- समीक्षा का दायरा सीमित

दिल्ली हाई कोर्ट ने सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा 2023, विशेष रूप से पेपर-2 (सीसैट) को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं के मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा अत्यंत सीमित होता है।

जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने असफल उम्मीदवारों द्वारा दायर याचिकाओं के समूह को खारिज किया। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2023 के सीसैट पेपर में पूछे गए कुछ प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम से बाहर थे। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह विशेषज्ञों की राय पर अपील की तरह विचार नहीं कर सकता और न ही प्रश्नों की पुनः जांच कर अपनी राय विशेषज्ञ संस्थाओं की राय के स्थान पर रख सकता है।

पीठ ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति व स्तर तय करना विषय विशेषज्ञों का कार्यक्षेत्र है। इस मामले में अदालतों के पास ऐसा करने की संस्थागत क्षमता नहीं होती। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सीसैट पेपर-2 में लगभग 11 प्रश्न कक्षा 11 और 12 की एनसीईआरटी पाठ्यक्रम से लिए गए, जबकि परीक्षा नियमों के अनुसार यह पेपर कक्षा 10 स्तर तक सीमित होना चाहिए था। इसी आधार पर उन्होंने संशोधित मेरिट सूची, नई मुख्य परीक्षा आयोजित करने या वैकल्पिक रूप से अतिरिक्त प्रयास और आयु में छूट देने की मांग की थी।

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इससे पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने भी इन दलीलों को खारिज कर दिया, जिसके बाद अभ्यर्थियों ने दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। पीठ ने कहा कि उम्मीदवारों की तरफ से विषय विशेषज्ञों के शैक्षणिक आकलन से असहमति मात्र, बिना किसी स्पष्ट त्रुटि या गंभीर अनियमितता को दर्शाए, न्यायिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बन सकती।

पीठ ने यह भी नोट किया कि अभ्यर्थियों की आपत्तियों के बाद संघ लोक सेवा आयोग ने एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित की थी, जिसने स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला कि सभी विवादित प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम के भीतर ही थे।

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