दिल्ली में केवल 30 हजार मजदूरों को मिले ग्रैप वाले 10000, कई मैसेज ही समझ नहीं पाए
अधिकारियों का कहना है कि 1.6 लाख मजदूरों से संपर्क किया गया या उनका सत्यापन (verification) किया गया, लेकिन केवल 30,183 को ही भुगतान मिला, जो कुल 30.2 करोड़ रुपये के करीब है। कई लोगों के लिए तो राहत राशि बिल्कुल नहीं आई।

दिल्ली में प्रदूषण के चलते ग्रैप लगने के बाद से कई मजदूरों को रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था। दिल्ली सरकार ने इस तकलीफ को देखते हुए निर्माण में लगे मजदूरों के लिए 10 हजार के राहत की घोषणा की थी। अब संकट ये है कि 2.46 लाख रजिस्टर्ड मजदूरों में से केवल 12 फीसदी को ही वो 10 हजार वाली राहत राशि मिल पाई है। कई ने तो भेजे वेरिफिकेशन मैसेज का जवाब नहीं दिया और कई ने तो मैसेज ही नहीं देखा। अब तक केवल 30,183 श्रमिकों को ही भुगतान मिल पाया है।
2025-26 की सर्दियों के दौरान, दिल्ली में प्रदूषण विरोधी योजना (GRAP) को दो चरणों में लागू किया गया था:
➤चरण III (Stage III): यह 11-26 नवंबर, 13 दिसंबर-2 जनवरी और 16 जनवरी से अब तक लागू रहा।
➤चरण IV (Stage IV): यह 13-24 दिसंबर और 16-20 जनवरी तक सक्रिय रहा।
दिसंबर की शुरुआत में, दिल्ली सरकार ने निर्माण कार्य पर लगी रोक के कारण होने वाले दिहाड़ी के नुकसान की भरपाई के लिए पंजीकृत श्रमिकों को राहत देने की घोषणा की थी।
वेरिफिकेशन में देरी और मजदूरों की परेशानी
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जिस समय राहत की घोषणा हुई, दिल्ली निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड (DBOCWWB) के पास 2.46 लाख पंजीकृत मजदूर थे। अधिकारियों का कहना है कि 1.6 लाख मजदूरों से संपर्क किया गया या उनका सत्यापन (verification) किया गया, लेकिन केवल 30,183 को ही भुगतान मिला, जो कुल 30.2 करोड़ रुपये के करीब है। अधिकारियों ने यह भी दावा किया कि कई मजदूरों के आवेदन इसलिए रद्द कर दिए गए क्योंकि उन्होंने फोन का जवाब नहीं दिया या वेरिफिकेशन वाले SMS को नहीं देखा। उन्होंने आगे बताया कि सत्यापन के बाद डेटा की दोबारा जांच चल रही है और यह प्रक्रिया इस महीने के अंत तक पूरी हो जाएगी। जहां एक तरफ अधिकारी नियमों के पालन की बात कर रहे हैं, वहीं मजदूरों का कहना है कि सत्यापन की प्रक्रिया बहुत ही असमान और भ्रमित करने वाली थी।
मंगोलपुरी के टाइल मजदूर बिट्टू के लिए इस पाबंदी ने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया। बिट्टू ने बताया, "जब काम रुका, तो हमारी जिंदगी भी रुक गई।" वह रोजाना 800-850 रुपये कमाकर अपने परिवार का पेट पालते थे। उन्होंने कहा, "नवंबर से दिसंबर तक कोई काम नहीं था। हमें कर्ज लेकर गुजारा करना पड़ा। 5 जनवरी को जाकर 10,000 रुपये मिले, लेकिन तब तक काफी नुकसान हो चुका था।"
विशेष जरूरतों वाले परिवारों के लिए यह स्थिति और भी गंभीर थी। प्रीति कुशवाहा के परिवार में एक दिव्यांग बेटा है, उन्होंने बताया कि देरी की वजह से वे कर्ज में डूब गए। प्रीति ने कहा, "हमने कर्ज लिया, मकान मालिक से कह दिया कि हम 3,000 रुपये किराया नहीं दे पाएंगे, और खाने में कटौती की, हम सिर्फ रोटी और चावल खाकर गुजारा कर रहे थे। विभाग ने हमें वेरिफिकेशन के लिए बुलाया, हमारे काम के बारे में सवाल किए और उसके बाद ही पैसे जारी किए।"
कई लोगों के लिए तो राहत राशि बिल्कुल नहीं आई। कुछ मजदूरों ने बताया कि बिना किसी कारण बताए उनके आवेदन रद्द कर दिए गए। कृष्णन, जो एक बेलदारी मजदूर हैं, ने कहा कि उनके पास वैध लेबर कार्ड होने के बावजूद कोई फायदा नहीं हुआ। उन्होंने अपना दुख जताते हुए कहा, "मुझे न तो मुआवजा मिला और न ही कोई स्पष्टीकरण। जब काम रुक जाए और सिस्टम भी साथ न दे, तो जिंदा रहना भी अनिश्चित लगने लगता है।"
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों के अनुसार, इतने कम भुगतान सिस्टम की खामियों को दर्शाते हैं। 'निर्माण मजदूर अधिकार अभियान' के थानेश्वर दयाल अडिगौर ने सवाल उठाया, "अगर 1.6 लाख श्रमिकों का वेरिफिकेशन हो चुका था, तो केवल 30,000 को ही मंजूरी क्यों मिली? अधिकारी दावा करते हैं कि मैसेज भेजे गए थे, लेकिन बहुत से मजदूर मैसेज पढ़ना नहीं जानते। लेबर कार्ड अपने आप में वेरिफिकेशन का सबूत है। इस बार प्रक्रिया को बिना वजह लंबा खींच दिया गया।"




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