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दिल्ली में फिनलैंड-नॉर्वे से भी कम बच्चे पैदा हो रहे, जापान की राह पर बढ़ता भारत?

क्या भारत जनसंख्या विस्फोट से घटती जन्म दर की ओर बढ़ रहा है? एलोन मस्क ने भी भारत में घटी जन्म दर को लेकर चिंता प्रकट की है। हैरान करने वाली बात यह है कि दिल्ली के लोग यूरोप के विकसित देशों फिनलैंड और नार्वे से भी कम बच्चे पैदा कर रहे हैं। आइए इसके पीछे की पूरी कहानी विस्तार से समझते हैं।  

Tue, 9 June 2026 03:28 PMRatan Gupta लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दिल्ली में फिनलैंड-नॉर्वे से भी कम बच्चे पैदा हो रहे, जापान की राह पर बढ़ता भारत?

क्या आपने कभी सोचा था कि एक दिन दिल्ली की जन्मदर फिनलैंड और नॉर्वे जैसे यूरोपीय देशों से भी नीचे चली जाएगी? दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शामिल एलोन मस्क के एक पोस्ट ने भारत में इसी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। मस्क ने भारत की घटती जन्मदर को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि देश की प्रजनन दर अब रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंच चुकी है। मस्क द्वारा शेयर किए गए आंकड़ों में सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा दिल्ली का है।

मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक ग्राफ साझा किया। इसमें भारत और अन्य देशों की टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) दिखाई गई है। इस ग्राफ के अनुसार भारत की औसत प्रजनन दर 1.9 है, जबकि दिल्ली में यह करीब 1.2 से 1.3 के बीच है। यह आंकड़ा फिनलैंड और नॉर्वे जैसे विकसित देशों से भी कम है। यानी दिल्ली की महिलाएं औसतन उतने भी बच्चे पैदा नहीं कर रही हैं, जितने इन यूरोपीय देशों में पैदा हो रहे हैं। इन आंकड़ों से सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है- क्या भारत ने जापान की राह पर चलना शुरू कर दिया है? यानी क्या भारत की आबादी भी बूढ़ी होने जा रही है?

सबसे पहले समझिए TFR क्या होती है?

टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) का मतलब है कि एक महिला अपने पूरे प्रजनन काल (15 से 49 वर्ष) में औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है। किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए यह दर कम से कम 2.1 होनी चाहिए। इसे रिप्लेसमेंट लेवल कहा जाता है। जब TFR 2.1 से नीचे चली जाती है, तो लंबे समय में आबादी बूढ़ी होने लगती है और नई पीढ़ी की संख्या घटने लगती है। यही समस्या आज जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों के सामने खड़ी है। तो अब यही सवाल उठ रहा है, क्या भारत भी बूढ़ा होने जा रहा है।

भारत की जन्मदर क्यों चिंता का विषय बन रही है?

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की TFR अब 1.9 पर पहुंच चुकी है। यह आंकड़ा 1950 के दशक में लगभग 5.7 हुआ करता था। यानी कुछ दशकों में भारत में परिवारों का आकार तेजी से छोटा हुआ है। हालांकि भारत की आबादी अभी भी बढ़ रही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जन्मदर लंबे समय तक इसी स्तर पर बनी रही, तो आने वाले दशकों में देश को भी वृद्ध होती आबादी की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

elon musk tweet photo

दिल्ली में हालात और ज्यादा अलग क्यों हैं?

दिल्ली का मामला भारत के औसत से भी अलग दिखाई देता है। यहां प्रजनन दर देश के औसत से काफी नीचे है। इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं।

  • सबसे पहला कारण है- रोजमर्रा के जीवन में बढ़ता खर्च

दिल्ली जैसे महानगर में घर, पढ़ाई-लिखाई, स्वास्थ्य और बच्चों की परवरिश का खर्च लगातार बढ़ा है। ऐसे में कई परिवार एक या दो बच्चों तक ही सीमित रहना चाहते हैं।

  • दूसरा बड़ा कारण है- महिलाओं की शिक्षा और रोजगार

पहले की तुलना में आज महिलाएं हायर एजुकेशन प्राप्त कर रही हैं। नौकरी कर रही हैं। शादी तथा बच्चे पैदा करने से जुड़े अपने फैसले खुद ले रही हैं। इसका असर परिवार के आकार पर भी दिखाई देने लगा है।

  • इसके अलावा शहरीकरण, देर से शादी, करियर को प्राथमिकता देना और समाज में छोटे परिवार को लेकर बढ़ती स्वीकृति भी जन्मदर में गिरावट के प्रमुख कारण माने जाते हैं।

क्या बच्चे पैदा करने और विकास में कोई कनेक्शन है?

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के डेवलपमेंट स्टडीज के उपाध्यक्ष नीलांजन घोष का मानना है कि प्रजनन दर में गिरावट अक्सर विकास से जुड़ी होती है। जिन राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के संकेतक बेहतर हैं, वहां जन्मदर तेजी से घटी है। केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी यही ट्रेंड देखा गया है।

“दिलचस्प बात यह है कि मस्क द्वारा साझा किए गए ग्राफ में दिल्ली, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे कई भारतीय क्षेत्र नॉर्वे और फिनलैंड के बराबर या उनसे नीचे दिखाई देते हैं।”

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क्या सिर्फ मंहगाई और परवरिश का खर्च ही कम बच्चे पैदा करने की वजह?

वहीं दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और खासकर दिल्ली में घटती जन्मदर की वजह सिर्फ बढ़ती महंगाई या बच्चों की परवरिश का खर्च नहीं है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (PM-EAC) की सदस्य शामिका रवि के अनुसार, दुनिया के कई सबसे अमीर देशों में भी जन्मदर बेहद कम है।

जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के कई विकसित देशों में लोगों की आय ज्यादा है, सरकारें परिवारों को आर्थिक मदद भी देती हैं, फिर भी वहां कम बच्चे पैदा हो रहे हैं। ऐसे में यह मान लेना कि सिर्फ पैसे की कमी लोगों को कम बच्चे पैदा करने के लिए मजबूर कर रही है, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

तो फिर कम बच्चे पैदा करने की और क्या वजह है?

शामिका रवि का मानना है कि असली बदलाव लोगों की सोच और प्राथमिकताओं में आया है। खासकर शहरी इलाकों में दंपती अब बड़े परिवार की बजाय एक या दो बच्चों तक सीमित रहना पसंद कर रहे हैं। पढ़ाई, करियर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, देर से शादी और बदलती जीवनशैली ने परिवार के आकार को प्रभावित किया है।

उनके मुताबिक सबसे चिंताजनक बात यह नहीं है कि लोग कम बच्चे पैदा कर रहे हैं, बल्कि यह है कि अब वे पहले की तुलना में कम बच्चे चाहते भी हैं। यही वजह है कि दिल्ली जैसे महानगरों में जन्मदर फिनलैंड और नॉर्वे जैसे देशों से भी नीचे पहुंच गई है।

क्या भारत जापान की राह पर बढ़ने लगा है?

फिलहाल भारत को तत्काल जनसंख्या संकट का सामना नहीं करना पड़ रहा है। देश अभी भी जवान है। हम युवा आबादी के दम पर दुनिया की सबसे बड़ी काम करने वाली जनसंख्या वाले देशों में शामिल हैं। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर जन्मदर लगातार नीचे बनी रही, तो आने वाले सालों में भारत को भी बूढ़ी आबादी, मजदूरों की कमी और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

यही वजह है कि एलोन मस्क का एक छोटा-सा पोस्ट भारत में बड़ी बहस का कारण बन गया है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत की जन्मदर 2.1 से नीचे क्यों पहुंच गई। असली सवाल यह है कि दिल्ली जैसे महानगरों में लोग अब पहले की तुलना में इतने कम बच्चे क्यों पैदा कर रहे हैं। और क्या आने वाले वर्षों में यह ट्रेंड पूरे देश की तस्वीर बदल देगा?

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