दिल्ली की हवा में राहत की खबर, कम जल रही पराली; लेकिन एक टेंशन भी!
सीपीसीबी के ताजा आंकड़ों के अनुसार दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने का हिस्सा गिरकर मात्र 3.5% रह गया है, जिससे अब स्थानीय स्रोतों जैसे वाहनों और निर्माण कार्यों पर नियंत्रण की आवश्यकता बढ़ गई है।

दिल्ली में हर सर्दी प्रदूषण की मार झेलनी पड़ती है, लेकिन इस बार एक सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस साल पराली जलाने का दिल्ली के PM2.5 प्रदूषण में योगदान काफी कम होकर मात्र 3.5% रह गया है। पिछले साल यह 10.6% था।
साल-दर-साल कम होता असर
नोएडा के कार्यकर्ता अमित गुप्ता की आरटीआई से मिले इन आंकड़ों से पता चलता है कि पराली जलाने का योगदान लगातार घट रहा है। साल 2020 और 2021 में यह 13% था, 2022 में 9%, 2023 में 11%, 2024 में 10.6% और अब 2025 में सिर्फ 3.5% रह गया है। ये आंकड़े इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटियरॉलजी के डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (DSS) पर आधारित हैं। यह सिस्टम सैटेलाइट डेटा, हवा की दिशा और मौसम के पैटर्न से प्रदूषण का हिसाब लगाता है।
ये आंकड़े इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटियरॉलजी के डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (DSS) पर आधारित हैं। यह सिस्टम सैटेलाइट डेटा, हवा की दिशा और मौसम के पैटर्न से प्रदूषण का हिसाब लगाता है।
विशेषज्ञों की चिंता-आंकड़े कम बताए जा सकते हैं
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये आंकड़े वास्तविकता से कम हो सकते हैं। वजह है पंजाब और हरियाणा के किसानों की नई रणनीति। iFOREST थिंक टैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, किसान अब पराली दोपहर 3 बजे के बाद जलाते हैं, ताकि सैटेलाइट की नजर से बच सकें। ज्यादातर सैटेलाइट दोपहर 2:30 बजे तक ही स्कैन करते हैं, जिससे कई आग की घटनाएं गिनती में नहीं आतीं।

CPCB अधिकारियों ने DSS की विधि का बचाव किया है। उनका कहना है कि अंतिम गणना में शाम 5 बजे तक का डेटा शामिल किया जाता है। फिर भी, पर्यावरण विशेषज्ञ सुनील दहिया जैसे लोग कहते हैं कि पुरानी तकनीक और सैटेलाइट की सीमाओं की वजह से पराली का योगदान कम आंका जा सकता है। नए जियोस्टेशनरी सैटेलाइट से किए गए अध्ययन ज्यादा सटीक परिणाम दिखा रहे हैं।
असली समस्या कहां है?
आरटीआई में दिल्ली के PM2.5 और PM10 के अन्य स्रोतों की जानकारी मांगी गई थी, लेकिन CPCB ने 2018 की पुरानी स्टडी का हवाला दिया। अमित गुप्ता के अनुसार, यह साफ बताता है कि पराली जलाना अब बड़ा स्रोत नहीं रहा। मुख्य प्रदूषण दिल्ली के स्थानीय कारणों से आ रहा है, जैसे वाहन, उद्योग, निर्माण कार्य और कचरा जलाना। उन्होंने कहा कि नई सोर्स अपॉर्शनमेंट स्टडी की जरूरत है।




साइन इन